शक्ति और भक्ति का पर्व नवरात्र

- मुकेश नागर
(स्वतंत्र पत्रकार एवं सामयिक विषयों के लेखक)
नवरात्र शक्ति और भक्ति का पर्व है। यह पर्व देवी माँ की उपासना और स्त्री शक्ति की आराधना का महापर्व है, जो पूरे नौ दिनों तक उल्लास, श्रद्धा और साधना से मनाया जाता है। भक्तगण इन दिनों में पूरी आस्था के साथ माँ भगवती के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं और शक्ति प्राप्ति की कामना करते हैं।
सनातन धर्म की परंपरा में अधिकांश त्योहार एक या दो दिन के ही होते हैं—जैसे जन्माष्टमी, रामनवमी, महाशिवरात्रि, रक्षाबंधन, होली या दीपावली। लेकिन गणेशोत्सव के दस दिवसीय आयोजन के बाद नवरात्र ही ऐसा पर्व है, जो पूरे नौ दिनों तक मनाया जाता है। गणेशजी को बुद्धि का देवता माना जाता है, वहीं नवरात्र में शक्ति की अधिष्ठात्री देवी भगवती की उपासना की जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि सनातन संस्कृति में बुद्धि के बाद शक्ति का स्थान सर्वोच्च है।
नवरात्र का आरंभ घटस्थापना से होता है। इन नौ दिनों में उपवास, व्रत, पूजन, भजन और विशेषकर गरबा नृत्य जैसे आयोजन होते हैं। विशेषकर महिलाएँ एवं कन्याएँ रंग-बिरंगे परिधानों में गरबा नृत्य के माध्यम से माँ दुर्गा को प्रसन्न करने का प्रयास करती हैं। यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि देवी के प्रति प्रेम और समर्पण का सजीव प्रदर्शन है।
नवरात्र सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे पूर्व आने वाले पितृपक्ष में भारी भोजन किए जाते हैं—खीर, पुरी आदि। नवरात्र में उपवास और फलाहार के माध्यम से शरीर को शुद्ध और संयमित किया जाता है। यह प्रक्रिया आने वाले शीतकाल के लिए शरीर को तैयार करती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह ऋतु परिवर्तन के समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का एक उत्तम उपाय है।
माँ दुर्गा इन नौ दिनों में अपने नौ रूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—में पूजी जाती हैं। श्रद्धालु अष्टमी और नवमी तिथियों को विशेष पूजन करते हैं, कुछ कन्या पूजन करते हैं और कुछ हवन द्वारा नवरात्रि का समापन करते हैं।
नवमी तिथि को माता की विदाई के साथ यह पर्व समाप्त होता है, लेकिन साथ ही एक संकल्प भी लेकर आता है कि हम पूरे वर्ष माँ भगवती की आराधना, सेवा और शक्ति को जीवन में धारण करेंगे।
जय माता दी।

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