उज्जैन के काल भैरव मंदिर में मदिरा का भोग: सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा, आस्था और सरकार की नई व्यवस्था

1 अप्रैल 2025 से मध्यप्रदेश सरकार ने उज्जैन सहित कई शहरों में शराब बंदी लागू कर दी है। इस निर्णय का उद्देश्य सामाजिक सुधार और जनहित को बढ़ावा देना है। हालांकि, उज्जैन के काल भैरव मंदिर में मदिरा भोग की परंपरा को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने मंदिर प्रशासन के लिए विशेष मदिरा आपूर्ति की व्यवस्था की है। अब मंदिर प्रशासन को सरकार द्वारा अधिकृत स्रोतों से सीमित मात्रा में मदिरा प्राप्त करने की अनुमति दी गई है।यह सुनिश्चित किया गया है कि इस परंपरा को श्रद्धालुओं की आस्था को बनाए रखते हुए नियंत्रित और व्यवस्थित रूप से निभाया जाए। मंदिर परिसर के बाहर शराब की बिक्री और अनधिकृत मदिरा चढ़ाने पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
उज्जैन का काल भैरव मंदिर भक्तों की आस्था और तांत्रिक परंपराओं का एक अनूठा संगम है। यहाँ काल भैरव को मदिरा (शराब) का भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस रहस्यमयी परंपरा के पीछे धार्मिक, तांत्रिक और दार्शनिक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं, जो इसे एक विशेष स्थान प्रदान करती हैं। कहा जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत स्वयं सम्राट विक्रमादित्य ने की थी, जिनका उज्जैन से गहरा संबंध रहा
सम्राट विक्रमादित्य और मदिरा चढ़ाने की प्रथा
इतिहासकारों और लोककथाओं के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य काल भैरव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने उज्जैन में काल भैरव की पूजा को बढ़ावा दिया और युद्ध से पहले तथा विशेष अनुष्ठानों के दौरान काल भैरव को मदिरा अर्पित करने की परंपरा शुरू की। ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य को काल भैरव की कृपा से अपराजेय शक्ति प्राप्त हुई थी, और उनके शासनकाल में यह परंपरा व्यापक रूप से लोकप्रिय हुई। उनकी इस परंपरा को तांत्रिक साधकों और आम जनता ने अपनाया, और तब से यह परंपरा उज्जैन के काल भैरव मंदिर में जारी है।
काल भैरव मंदिर और इसकी मान्यता
उज्जैन स्थित यह मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के समीप स्थित है और इसे अत्यंत शक्तिशाली एवं चमत्कारी माना जाता है। मान्यता है कि उज्जैन के काल भैरव मंदिर में स्वयं काल भैरव विराजमान हैं और वे अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर करते हैं।काल भैरव को यहाँ मदिरा अर्पित करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। कहा जाता है कि मदिरा अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और वे भय, बाधाओं और शत्रुओं से मुक्त हो जाते हैं।
धार्मिक मान्यताएँ
पुराणों के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव का अपमान किया, तो उनके क्रोध से काल भैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया। इस कारण काल भैरव को ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिए तीर्थयात्रा करनी पड़ी, और अंततः उज्जैन में उनकी विशेष उपासना स्थापित हुई। इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ काल भैरव की प्रतिमा को मदिरा अर्पित की जाती है और ऐसा कहा जाता है कि मूर्ति स्वयं मदिरा ग्रहण कर लेती है। यह चमत्कार भक्तों की आस्था को और भी मजबूत बनाता है।
तांत्रिक परंपरा और शक्ति साधना
उज्जैन सदियों से तंत्र साधना और अघोर परंपरा का केंद्र रहा है। काल भैरव को तांत्रिक शक्तियों के अधिपति माना जाता है, और यहाँ उनकी साधना करने वाले साधु-संत विशेष रूप से मदिरा अर्पित करते हैं। तंत्र साधना में मदिरा को चेतना जागरण और मोह-माया से मुक्ति का साधन माना जाता है।
दार्शनिक दृष्टिकोण
मदिरा को सांसारिक मोह, अहंकार और बंधनों का प्रतीक माना गया है। इसे काल भैरव को अर्पित करने का अर्थ यह है कि साधक अपनी माया और अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से भगवान में समर्पित हो रहा है। यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आत्मविकास और भयमुक्ति का मार्ग माना जाता है।
लोक परंपरा और सामाजिक स्वीकृति
उज्जैन के काल भैरव मंदिर में मदिरा चढ़ाने की परंपरा को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहाँ आम भक्त से लेकर व्यापारी, पुलिस कर्मी और राजनेता तक विशेष रूप से पूजा करने आते हैं ताकि वे अपने कार्यों में सफलता प्राप्त कर सकें और जीवन की बाधाओं से मुक्त हो सकें।