देश में आज वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है लेकिन इसके खिलाफ जंग की शुरुआत भारत में करीब 114 साल पहले शुरू हुई थी। हालांकि यह आज भी किसी मुकाम पर नहीं पहुंच पाई है। वायु प्रदूषण के खिलाफ पहला कानून बंगाल स्मोक न्यूसेंस एक्ट 1905 में बंगाल में बना था। 

इसके बाद कई और प्रांतों में कानून बने। लेकिन स्वतंत्र भारत में अस्सी के दशक में इस खतरे की गंभीरता को महसूस किया गया। वायु प्रदूषण पर अब तक हुए तमाम शोध और उसके इतिहास पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा सीएसआईआर की नागपुर स्थित प्रयोगशाला नीरी ने बुधवार को एक पोर्टल लांच किया है। इसी में उल्लेख है कि वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए अंग्रेजों ने पहला कानून 1905 में बनाया।

इस बंगाल स्मोक न्यूसेंस अधिनियम में भट्टियों आदि से एक सीमा से ज्यादा वायु प्रदूषण होने पर दो हजार रुपये का जुर्माना रखा गया था। दूसरी बार यह गलती करने पर जुर्माने की राशि पांच हजार रुपये रखी गई थी। तब के हिसाब से यह सख्त कानून था। अस्सी और नब्बे के दशक में भी कई और कानून बने।

वन संरक्षण कानून भी आजादी से पहले ही बना था। नीरी के इस पोर्टल इंडिया एयर में 3300 अध्ययन, 1550 लेख, 700 रिपोर्ट और नौ कानूनी मामलों का ब्योरा है। शोधकर्ताओं के लिए यह पोर्टल महत्वपूर्ण साबित होगा।

आजादी के तुरंत बाद नहीं दिखी सख्ती: 
नीरी के निदेशक डॉ. राकेश कुमार बताते हैं कि वायु प्रदूषण को लेकर जितने सख्त कानून आजादी के पहले बने, उतने बाद में नहीं बने। 1913 में बांबे स्मोक कानून बना। कई शोध भी हुए। भोर कमेटी ने भी इस मुद्दे पर शोध किए। 1963 में गुजरात स्मोक न्यूसेंस कानून बनाया गया जो अहमदाबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में लागू हुआ।

सांसदों की मांग नहीं पूरी हुई: 
पोर्टल में उपलब्ध वायु प्रदूषण के इतिहास में बताया गया है कि आजादी के बाद 1972 में जब संसद में जल प्रदूषण के खिलाफ कानून पारित हो रहा था तो सांसदों ने वायु प्रदूषण के खिलाफ भी कानून बनाने की मांग रखी। लेकिन तब यह मांग पूरी नहीं हुई। कमेटियां बैठाई गईं और करीब 12 सालों के बाद 1982 में वायु प्रदूषण कानून बनाया गया।