इन्दौर । भारतीय संस्कृति ज्ञान के साथ विज्ञान सम्मत भी हैं। अणु और परमाणु से भी ज्यादा ताकतवर हैं गीता और हमारे धर्मग्रंथों के श्लोक और मंत्र। गीता मनुष्य को कुरूक्षेत्र के मैदान में खड़े अर्जुन की तरह दिव्य दृष्टि प्रदान करती है। गीता के श्रवण, मनन, मंथन और चिंतन से हम अहंकारमुक्त हो सकते हैं। गीता जैसे दिव्य ग्रंथ मानव मात्र के लिए हर युग में मार्गदर्शक हैं। मनुष्य को यदि आत्म निरीक्षण, आत्म कल्याण और आत्म मंथन करना है तो गीता का आश्रय लेना चाहिए क्योंकि यह वह अदभुत और अनुपम सृजन है जो विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतरा है, लेकिन विश्व के 80 प्रतिशत वैज्ञानिक तमोगुणी बुद्धि की तीव्रता वाले हैं, जो विकास की जगह विनाश की रचना कर रहे हैं। तमोगुण की अधिकता से ही विनाश का मार्ग प्रशस्त होता है।
ये दिव्य विचार हैं जगदगुरू शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के, जो उन्होंने आज सांय गीता भवन में चल रहे 62वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव की महती धर्मसभा में व्यक्त किए। शंकराचार्यजी ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि गीता का प्रत्येक मंत्र अनुशीलन योग्य है। बुद्धिमानों की सफलता इसी बात में निहित है कि वे अपनी बुद्धि एवं मन को सर्वेश्वर में समाहित करें और भगवान की कृपा की अनुभूति करें। उपनिषदों के आधार पर हम सच्चिदानंद के अत्यंत निकट पहुंच सकते हैं। यही नहीं, काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे मनोविकार भी क्षीण होकर हमें दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्ति दिला सकते हैं। गीता के प्रत्येक अध्याय में अणु और परमाणु से भी अधिक सृजन की शक्ति है। हरिद्वार से आए स्वामी सर्वेश चैतन्य ने कहा कि जिस तरह पानी के ऊपर जमी काई के कारण अंदर का दृश्य नहीं दिखाई देता उसी तरह हमारे पाप कर्मो कें कारण अपना वास्तविक चरित्र सामने नहीं आ पाता। अपने पाप दूर होने के बाद ही हमें अपने मूल स्वरूप का ज्ञान होगा। निष्काम कर्म पर गीता में जोर दिया गया है। निष्काम कर्म का उपदेश देना आसान है लेकिन अमल करना बहुत कठिन है। गोधरा की साध्वी परमानंदा सरस्वती ने कहा कि सत्संग में वहीं लोग आ पाते हैं, जिन पर भगवान की कृपा होती है। संसार के सुख एवं वैभव के साधन तभी तक है, जब तक हमारी सांस हैं। परीक्षित ने भी भागवत कथा श्रवण कर अपनी चिंता का समाधान प्राप्त किया।
आचार्य पं. कल्याणदत्त शास्त्री द्वारा वैदिक मंगलाचरण के बीच गीता भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष गोपालदास मित्तल, मंत्री राम ऐरन, रामविलास राठी, महेशचंद्र शास्त्री, सोमनाथ कोहली, प्रेमचंद गोयल, गीता भवन हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. आर.के. गौड़ आदि ने शंकराचार्यजी का पादुका पूजन किया। अध्यक्षता कर रहे अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के आचार्य जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज ने भी शंकराचार्यजी का स्वागत किया। इसके पूर्व दोनों सत्रों में उज्जैन के स्वामी परमांनद, वृंदावन के स्वामी केशवदेव, चित्रकूट के पं. महेंद्र मिश्र मानस मणि, चिन्मय मिशन इन्दौर के स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती वृंदावन के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती, गोधरा की साध्वी परमानंदा सरस्वती, हरिद्वार के स्वामी सर्वेश चैतन्य, संन्यास आश्रम नई दिल्ली के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरी, वल्लभाचार्य महाप्रभु संप्रदाय उदयपुर के युवराज गोस्वामी वागधीश बाबा ने भी गीता सहित विभिन्न विषयों पर अपने प्रभावी विचार व्यक्त किए। 
:: पोलीथिन के बहिष्कार का संकल्प :: 
जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज ने उपस्थित भक्तों एवं संतों को सिंगल यूज पोलीथिन एवं प्लास्टिक के बहिष्कार की शपथ दिलाई। उन्होंने कहा कि हमारी सैकड़ों गौमाता आए दिन पोलीथिन अटकने की वजह से मौत की शिकार हो रही हैं। पोलीथिन का प्रयोग खुद भी नहीं करें और दूसरों को भी नहीं करने दें। मंच का संचालन डाकोर के संत देवकीनंदन दास ने किया। अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ आज की सत्संग सभा का समापन हुआ।    

:: संतों के प्रवचन :: 
चिन्मय मिशन इन्दौर के स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती ने कहा कि सदकर्म के साथ अनेक दोष भी जुड़ जाते हैं। कर्ता में अहंकार का भाव आ जाता है। अहंकार ऐसा बाधक बनता है कि हम हंस भी नहीं सकते। सदकर्म को यदि हमने ईश्वर की प्रीति और प्रेरणा से जोड़ दिया तो वह सदकर्म ही कर्मयोग बन जाएगा। कर्मयोग ही भक्ति योग है। यदि हमने ईश्वर के प्रति अपने कर्म समर्पित कर दिए तो वे कर्म सदकर्म हो जाएंगे। भक्ति योग बन गया तो अंतःकरण भी शुद्ध हो जाएगा। अंतःकरण शुद्ध हुआ तो ज्ञान का प्रवेश भी स्वतः हो जाएगा। 
चित्रकूट से आए पं. महेंद्र मिश्र ने कहा कि माया हमारे कर्मों में सबसे बड़ी बाधा है। मैं और मेरा माया के ही रूप हैं। जहां आज हमारी नेमप्लेट लगी है, वहां कल किसी और की लग जाएगी, यह संसार का नियम है। माया से मुक्त होने के लिए भक्ति जरूरी है। ज्ञान तर्क करता है। अकेले ज्ञान से परमात्मा तक पहुंचना संभव नहीं है। ज्ञान के साथ भक्ति भी जरूरी है। 
संन्यास आश्रम दिल्ली के महामंडलेश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरी ने कहा कि राग और द्वेष मनुष्य के दो ऐसे शत्रु हैं जो हर समय व्यक्ति को घेरे रहते हैं। जब तक राग नहीं होगा तब तक द्वेष भी नहीं होगा। द्वेष से ही हमारी शत्रुता बढ़ेगी। इनसे मुक्ति के लिए गीता जैसे धर्मग्रंथों का आश्रय जरूरी है जो गृहस्थी के रिश्तों को निभाने में भी सहायक है। 
महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने कहा कि गीता हिंदुओं का राष्ट्रीय ग्रंथ है। घर-घर में गीता होना चाहिए। हम बरसों से गीता भवन आ रहे हैं, संतों के प्रवचन सुन रहे हैं लेकिन उन्हें आचरण में कितना उतार रहे हैं यह चिंतन भी करें। गीता अर्जुन के ज्ञान में भी उतर गई थी तभी उसका मोह नष्ट हुआ। हमारी साधना चेतना का रूपांतरण है। आचरण में शुद्धता के लिए गीता क्रांतिकारी ग्रंथ है। हर वर्ष अपना स्वयं का आंकलन करें कि गीता श्रवण के बाद हमारे चरित्र और स्वभाव में कितना परिवर्तन आया है। 

:: जिसके जीवन में नहीं है गीता, उसका जीवन बिल्कुल रीता : रामदयालजी 
अध्यक्षीय आशीर्वचन में स्वामी रामदयाल महाराज ने कहा कि जिसके जीवन में नहीं है गीता, उसका जीवन बिल्कुल रीता। जो भोजन करता है, उसे भजन भी करना चाहिए। जो भोजन देता है उसके लिए भी भजन करना चाहिए। गीता में क्या है ऐसा पूछने वालों से मैं पूछना चाहता हूं गीता में क्या नहीं है। ज्ञान, ध्यान और भगवान - ये तीनों ही गीता में उपलब्ध है। खोजने वाला चाहिए। संत किसी वेश का नहीं, ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था का नाम है।    

:: आज के कार्यक्रम ::
गीता भवन में चल रहे 62वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव में मंगलवार 10 दिसंबर को सुबह 8 बजे से 8.30 बजे तक भजन संकीर्तन के बाद सुबह 8.30 बजे हरिद्वार के डॉ. श्रवण मुनि, 9 बजे हरिद्वार के ही स्वामी सर्वेश चैतन्य, 9.30 बजे स्वामी देवमित्रानंद गिरी, 10.15 बजे वृंदावन के स्वामी प्रणवानंद सरस्वती, 11 बजे भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी जगदीशपुरी के पश्चात 12 बजे से अध्यक्षीय आशीर्वचन होंगे। दोपहर की सत्संग सभा में 2 से 3 बजे तक भजन-संकीर्तन के बाद 3 बजे पानीपत के स्वामी दिव्यानंद सरस्वती, 3.30 बजे गोधरा की साध्वी परमानंदा सरस्वती, 4 बजे गोराकुंड रामद्वारा के संत अमृतराम, 4.30 बजे चित्रकूट के पं. महेंद्र मिश्र तथा सांय 5 बजे से जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के प्रेरक उद्बोधन होंगे। सांय 6 बजे जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज अध्यक्षीय आशीर्वचन देंगे।
उमेश/पीएम/9 दिसम्बर 2019 

संलग्र चित्र - गीता भवन में 62वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव में संबोधित करते जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंदजी सरस्वती। दूसरे चित्र में जगदगुरू शंकराचार्य एवं रामस्नेही संप्रदाय के जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज की आत्मीय मुलाकात के क्षण। अंतिम चित्र में उपस्थित श्रद्धालु पोलीथिन मुक्ति की शपथ लेते हुए।