सिखों के प्रथम गुरू नानक देव से एक बार किसी ने पूछा कि गुरू के दर्शन करने से क्या लाभ होता है? गुरू नानक ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया कि इसी रास्ते पर चले जाओ और रास्ते में तुम्हें सबसे पहले जो भी मिले, उससे अपने इस प्रश्न का जवाब पूछ लेना। गुरू नानक की आज्ञा पाकर वह व्यक्ति उस रास्ते पर आगे बढ़ लिया। थोड़ा आगे जाने पर उसे सबसे पहले एक कौआ नजर आया। गुरू नानक की आज्ञानुसार उसने कौवे से अपने प्रश्न का उत्तर पूछा लेकिन यह क्या? प्रश्न पूछते ही कौवे ने वहीं दम तोड़ दिया। यह दृश्य देख वह व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा वापस गुरू नानक देव के पास पहुंचा और सारा हाल कह सुनाया। उसके बाद गुरू नानक ने कहा कि अमुक घर में एक गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया है, तुम जाकर उससे अपने इस सवाल का जवाब पूछो। इस बार भी वह व्यक्ति जैसे ही वहां पहुंचा और बछड़े से अपना सवाल किया, वह भी तुरंत मर गया। घबराया हुआ वह व्यक्ति फिर से दौड़ा-दौड़ा गुरू नानक देव पहुंचा और घटना की जानकारी दी। अब की बार गुरू नानक जी ने उसे कहा कि तुम फलां घर में जाओ, जहां अभी-अभी एक बच्चे ने जन्म लिया है। तब उस व्यक्ति जी गुरू नानक से ही सवाल किया कि अगर मेरे सवाल पूछते ही वह नवजात शिशु भी मर गया तो? गुरू नानक ने कहा कि तुम वहां जाकर बच्चे से सवाल करके तो देखो, तुम्हारे सवाल का जवाब तुम्हें वहीं मिलेगा।’’ गुरू जी के आदेश पर वह व्यक्ति इस बार उनके बताए स्थान पर पहुंचा। वहां उस वक्त बच्चे के आसपास कोई नहीं था। अवसर पाकर उस व्यक्ति ने उससे अपना वही सवाल दोहराया तो बच्चे ने गुरू की महिमा का वर्णन करते हुए उत्तर दिया कि मैंने स्वयं तो कभी गुरू के दर्शन नहीं किए लेकिन तू जब पहली बार गुरू जी के दर्शन करके मेरे पास आया तो मुझे कौवे की योनि से मुक्ति मिली तथा बछड़े का जन्म मिला और जब तू दूसरी बार गुरू के दर्शन करके मेरे पास आया तो मुझे बछड़े से इंसान का जन्म मिला। इसलिए इतना बड़ा हो सकता है गुरू के दर्शन करने का फल, फिर चाहे गुरू के दर्शन आंतरिक हों या बाहरी।
गुरू नानक जब 12 वर्ष के थे तो उनके पिता ने उन्हें 20 रुपये देते हुए अपना एक व्यापर शुरू करने को कहा ताकि वे व्यापार के विषय में कुछ जान सकें। व्यापार के लिए पिताजी द्वारा दिए गए वही 20 रुपये नानक ने गरीबों और संतों को खाना खिलाने में खर्च कर दिए। जब पिताजी ने उनके घर लौटने पर उनसे पूछा कि तुम्हारे व्यापार का क्या रहा तो नानक ने उत्तर दिया कि मैंने आपके दिए उन 20 रुपयों से सच्चा सौदा कर लिया। नानक ने जिस स्थान पर उन पैसों से गरीबों व संतों को खाना खिलाया था, वहीं पर ‘सच्चा सौदा’ नाम का गुरूद्वारा स्थित है।
एक बार गुरू नानक अपने मित्र और परम प्रिय शिष्य मरदाना के साथ कपूरथला के सुल्तानपुर लोधी में वैन नदी के किनारे बैठे थे। अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए। लोगों ने सोचा कि गुरू नानक अब नहीं रहे और उन्हें नदी में डूबा हुआ समझकर सभी अपने-अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी तीन लंबे अंतराल के बाद गुरू नानक अचानक नदी से बाहर निकले और उन्होंने ‘एक ओंकार सतनाम’ शब्द का उच्चारण किया। कहा जाता है कि गुरू नानक ने वहीं पर ईश्वर से साक्षात्कार किया था। नदी से बाहर आने के बाद गुरू नानक ने वहीं पर एक बेर का बीज बोया, उसी बेर का बीज फलकर आज बेर के एक बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। उसी स्थान पर अब ‘गुरूद्वारा बेर साहिब’ स्थित है।
उत्तराखण्ड में चम्पावत जिले के पाटी विकास खंड में लधिया और रतिया नदी के संगम पर स्थित है ‘रीठा साहिब गुरूद्वारा’, जो चम्पावत से करीब 72 किलोमीटर दूर स्थित है। रीठा साहिब गुरूद्वारा को सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है, जहां हर साल मई-जून माह में जोड़ मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस तीर्थ स्थल का यह नाम कैसे पड़ा, यह जानना भी बेहद दिलचस्प है। दरअसल मान्यता है कि गुरू नानक देव सन् 1501 में एक बार अपने परम प्रिय शिष्य मरदाना के साथ यहां पहुंचे थे, जहां उनकी मुलाकात सिद्ध मंडली के महंत गुरू गोरखनाथ के शिष्य ढ़ेरनाथ से हुई। जब गुरू नानक और ढ़ेर नाथ के बीच लंबा संवाद चल रहा था, उसी दौरान गुरू नानक के शिष्य मरदाना को जोर की भूख लगी। वहां उसे कोई भोजन नहीं मिला तो वह निराश होकर गुरू नानक के पास पहुंचा। गुरू नानक ने मरदाना को सामने खड़े रीठे के पेड़ से फल तोड़कर खाने को कहा। रीठे का फल आमतौर पर स्वाद में कड़वा होता हैं, इस वजह से मरदाना सोच में पड़ गए लेकिन चूंकि गुरू जी का निर्देश था, इसलिए उसने रीठे का फल तोड़कर खाना शुरू किया। स्वाद में उसे वह बहुत कड़वा लगा। थोड़े दूर बैठे गुरू नानक यह नजारा ध्यान से देख रहे थे। उनसे अपने प्रिय शिष्य की भूख बर्दाश्त नहीं हुई, इसलिए उन्होंने स्वयं रीठे के पेड़ से फल तोड़कर मरदाना को खाने के लिए दिया। आश्चर्य! गुरू जी द्वारा मरदाना को दिया गया वह कड़वा रीठा फल उनकी दिव्य दृष्टि से मीठे फल में बदल गया था। आस्था के इस केन्द्र में गुरू नानक के चमत्कार से रीठे के उस वृक्ष पर लगे सभी फल कड़वे से मीठे रीठे में परिवर्तित हो गए। इस तरह अपने उस प्रवास के दौरान गुरू नानक ने यहां के कड़वे रीठे को भी मिठास देकर इस स्थान को एक प्रमुख तीर्थ स्थल में परिवर्तित कर दिया और तभी से इस स्थान का नाम ‘रीठा साहिब’ हो गया। इस गुरूद्वारे में जितने भी श्रद्धालु पहुंचते हैं, सभी को प्रसाद स्वरूप मीठा रीठा ही बांटा जाता है। ऐसी थी गुरू नानक देव की महिमा!