भोपाल प्रदेश में सात करोड़ पौधों के रोपण में करोड़ों रुपए का घपला किए जाने की जांच ईओडब्ल्यू से कराए जाने के वनमंत्री के फैसले में अब तक विभाग के अफसरों ने कोई एक्शन नहीं लिया है। अपर मुख्य सचिव और सचिव वन के बीच इसको लेकर कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं और यह तय हुआ है कि इस मामले में अंतिम फैसला सीएम कमलनाथ करेंगे। प्रकरण से संबंधित फाइल सीएम सचिवालय को भेजी जाएगी।  इसके पीछे अफसरों का तर्क है कि चूंकि इस पौधरोपण के कार्यक्रम में अकेले वन विभाग एजेंसी नहीं है। चार विभागों को इस काम को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इतना ही नहीं इस पूरे कार्यक्रम के लिए मुख्य एजेंसी योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग था जिसके द्वारा विभागों को टारगेट और जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसलिए पौधरोपण घोटाले की जांच का फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे। बताया जाता है कि इसी के चलते अफसरों के बीच चर्चा के बाद सीएम सचिवालयर फाइल भेजने की तैयारी है। इसी कारण विभाग ने वनमंत्री उमंग सिंघार के निर्देश के बाद भी ईओडब्ल्यू को अब तक पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के विरुद्ध जांच करने और एफआईआर करने के लिए पत्र नहीं लिखा है जबकि मंत्री इसको लेकर बयान दे चुके हैं।

विभाग के अफसरों के अनुसार वर्ष 2017 में 2 जुलाई को कराए गए पौधरोपण में गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने का टारगेट रखा गया था। इसके लिए जो व्यवस्था तय थी, उसके मुताबिक पौधरोपण के लिए गड्ढे खोदने, पौधे लगाने और गड्ढे भरे जाने की अलग-अलग फोटोग्राफी की जानी थी और तय समय के भीतर उसे गिनीज बुक में दर्ज करने के लिए भेजना था। इसके लिए सबसे बड़ी चूक फोटोग्राफी में हुई। पौधरोपण के लिए एजेंसी वन विभाग के अलावा हार्टिकल्चर, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग थे। इन विभागों के अफसरों ने फोटोग्राफी के तीनों ही एंगिल पर काम नहीं किया। कई अफसर की टीम ने दो तो किसी ने एक ही एंगिल पर फोटोे खिंचवाए। कुछ ही अधिकारियों ने तीनों ही एंगिल से फोटोग्राफी कराई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि गिनीज बुक में दर्ज करने की पात्रता खत्म हो गई और इसे देखते हुए प्रस्ताव गिनीज बुक को भेजने का फैसला शासन ने टाल दिया।

इसके बाद जब पौधरोपण की जांच की बात उठी तो कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्ट में प्रदेश में 2.81 करोड़ पौधे रोपे जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद यह मसला उठा कि पौधरोपण में घपला हुआ है। उधर इस घपले की जांच के लिए विधानसभा में बनाई गई समिति में चार मंत्री शामिल किए गए थे। मंत्रियों की समिति ने भी इस मामले में कोई रिपोर्ट नहीं दी है। इसलिए भी वन विभाग के अफसर इस केस को ईओडब्ल्यी को भेजने के पहले सीएम के पास भेजने को सहमत हुए हैं।