आज की परिस्थितियों और लंबी तालाबंदी के बाद मध्यमवर्ग ऐसी स्थिति में फंस गया है जहां से वह कुछ नहीं देख पा रहा है । मजदूरों ,श्रमिकों और  छोटे कारीगरों के पलायन के बाद वह भी अपने मन में कुछ उथल पुथल  महसूस कर रहा है। इस कोरोना काल में  सरकार  और अन्य सामाजिक संस्थाओं ने अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए निम्न व  सामान्य वर्ग का भरपूर सहयोग किया है. चाहे वह आर्थिक रहा हो या सामग्री वितरण या अन्य प्रकार से सहयोग के रूप में किया हो। अंततः उनकी समस्याओं को सबने देखा और समाज ने  उनका भरपूर साथ दे इस  आपातकाल से उभारने   का प्रयास किया। लघु एवं मध्यम उद्यमों के प्रति सरकार ने सकारात्मक रूख अपनाते हुए कुछ न कुछ अपने 20 लाख करोड़ की झोली में से निकाल कर दे दिया है.  अब बचा बेचारा मध्यम वर्ग,  जो निम्न वर्ग से थोड़ा ऊपर उठकर अपनी  एड़ी ऊंची करके और गर्दन उचका  कर अपने को उच्च वर्ग के करीब महसूस करने लगता है.  यह दिन रात अपने आगे जलेबी बंधी देख उसको पाने का प्रयास में दौड़ता रहता है. उसकी समस्या,उसकी स्थिति को  समझने का प्रयास कभी किसी ने नहीं किया।  यह वह वर्ग है जो सब्सिडी की सीढ़ी से दूर हो कर कर  सभी  कल्याणकारी योजनाओं से भी बाहर हो चुका है. टेक्स उसको नित-प्रतिदिन जीवन के हर कदम पर ईमानदारी से देना ही  है। वह ईमानदारी से कमाने की दौड़ में कभी-कभी पिछड़ भी जाता है पर प्रयास करता रहता है। उसी वर्ग पर आज तक किसी भी सरकार का ध्यान नहीं गया है। ऐसे में उसकी स्थिति क्या हो सकती  है? इस पर विचार करने की जरूरत है ऐसा ना हो कि वह अपनी स्थिति से मजबूर होकर पलायन  कर जाये।
पलायन  पर कैसे ?आज शहरों  में जो भी मध्यम वर्ग है वह या तो नौकरी में लगा है या छोटी मोटी  सरकारी नौकरी में। इस  लंबी तालाबंदी की अवधि में सरकारी नौकरी वाले तो ठीक पर  प्राइवेट नौकरी करने वालों को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। उसे न तो इस अवधि की तनख्वाह मिली और न कहीं से सहयोग।  वह किसी से  सहायता मांग भी नहीं सकता। उसको मध्यम वर्ग की 'शर्म' ने कहीं का नहीं छोड़ा। अपने  छोटे-छोटे बच्चों को उसने अपनी पिछली  बचत से इस समय कैसे खाना खिलाया यह  वह ही  जानता है.  उसमें कैसे घर के भंडार से अपने बच्चों का पेट भरा होगा यह उसी का जमीर बता सकता है। अपने सामने अन्यों को बंटने  वाली सहायता सामग्री के लिए हात  नहीं पसार पाया।  उस पर मध्यम वर्ग का लेवल जो लगा था। इस व्यथा से  गुजरने वाले परिवारों का भविष्य क्या है यह भी अभी अनिश्चित है।   करोना वाइरस  के साथ नई जीवनशैली में वह जहां काम करता है वहां भी उसकी नौकरी रहा  पाएगी या नहीं यह अनिश्चित है। ऐसे में महानगरों,नगरों  में बसने वाले ये  मध्यम वर्ग के लोग भी अब अपने-अपने गांव अपने पैतृक स्थान पर जाने का मन बनाने लगे हैं। देशभर के मजदूर वर्ग में जिस तेजी से अपने घर की ओर पलायन किया है वे दृश्य तो आप सभी ने देखे हैं।  उन्होंने ना अपने खाने-पीने की चिंता की न  साधनों की चिंता की और चल पड़े अपने घर की ओर।  पैरों के छाले,  छोटे-छोटे बच्चों की रुलाई और भूख प्यास से व्यथित मजदूरों की  कहानी हमने टीवी ,वीडियो और समाचार पत्रों के माध्यम से देखी  सुनी है। अब  कहीं यही व्यथा इस मध्यम वर्ग  को भी अपने घर से पलायन को  मजबूर ना कर दे।  
जैसे मजदूर वर्ग से हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़, निर्माण कार्य जुड़े हैं इस मध्यम वर्ग से भी  उसके आगे का कार्य संपन्न होता है।   छोटे दुकानदार, मार्केटिंग कार्य, सेवा क्षेत्र के कार्य, छोटी गुमटियां, छोटी होटल और रेस्तरां जैसे छोटे-छोटे कई कार्य  हैं जिनके  संचालन में यह वर्ग सहयोग करता है।  इस लंबी तालाबंदी में उसका साहस तोड़ दिया है वह भी यह सोचने लगा कि जब ऐसे आपातकाल में सरकार व समाज का सहयोग नहीं मिला तो भविष्य में क्या मिलेगा ? इससे तो अच्छा है कि वह अपने परिवार के साथ अपने पैतृक  स्थान पर चला जाए जहां उसे कम से कम जीवन जीने की शांति तो मिल जाएगी।   वहीं रहकर बड़े शहरों के अनुभव के आधार पर अपना छोटा मोटा काम शुरू कर सकता है और अपने लोगों  के बीच सुकून पा सकता है।
ऐसे में सरकार और समाज को एक बार इस विषय की ओर ध्यान देना चाहिए और इस करोड़ों के पैकेज का कुछ भाग मध्यम वर्ग के लिए भी हो जाए और समाज का सहयोगी वर्ग भी  मध्यम वर्ग के साथ सहयोगी भावना अपनाएं तो यह पलायन शायद कुछ थम जाये।
- डॉ. कमल हेतावल  kamalhetawal@yahoo.co.in
989375702
डॉ कमल हेतावल इंदौर