योग में आसन, प्राणायाम, मुद्रा और आहार-विहार आदि पर तो बहुत शोध हुए हैं, अब ध्यान और मुद्रा की बारी है। इस विधा के अनुसार शांत मस्तिष्क ऊर्जा का केंद्र है तो निर्मल मन शांति और स्थिरता का। शास्त्रों  में इन केंद्रों की उपमा ब्रह्मलोक और क्षीर सागर से दी गई है। मस्तिष्क या खोपड़ी में जहां दिमाग माना जाता है वहां एक केंद्र की कल्पना की गई है। इस केंद्र को ब्रह्मकेंद्र कहते हैं। ब्रह्मरंध अर्थात् मस्तिष्क का मध्यबिन्दु। ब्रह्माण्ड के मध्य में ब्रह्मलोक माना गया है और ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क में है। जीव और ब्रह्म के बीच अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान का माध्यम यही है।   
पृथ्वी भी मनुष्य की तरह अंतग्रही आदान प्रदान से समृद्ध होती रहती है। उससे सूक्ष्म आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटते रहते हैं। इस आदान-प्रदान का केन्द्र द्वार ध्रुव है। ठीक इसी प्रकार मस्तिष्क का मध्य केन्द्र ब्रह्मरंध्र सहस्रार कमल है। यह जितना सशक्त या दुर्बल होता है उसी अनुपात में जीवन को ब्रह्मसत्ता के अनुदान पाने की सम्भावना बढ़ती है। अन्तर्जगत के इस ब्रह्मलोक की अमृत वर्षा का लाभ लेने के लिए खेचरी मुद्रा का साधन बताया गया है । ध्यान मुद्रा में शान्त चित्त का साधन बताया गया है। ध्यान मुद्रा में शान्त चित्त से बैठकर जीभ के अगले भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पन्दन पैदा किये जाते हैं। उस उत्तेजना से सहस्र दल कमल की प्रसुप्त स्थिति जागृति में बदलती है। यह खेचरी मुद्रा है। इस स्तर पर अनुभव होने वाले उपादानों का वैज्ञानिक विश्लेषण अभी बाकी है। अध्यात्मविदों के अनुसार यदि भावना और प्रिया का सही समन्वय करके इस साधना को किया जा सके तो चेतना क्षेत्र में आनन्द और कार्य क्षेत्र में उल्लास की उपलब्धि होती है।