धर्म के साथ आचार्य ने अपने नीति सूत्र में ऐसी बहुत से बातों का वर्णन किया है जिसे मानव को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। कहा जाता है चाणक्य की इन नीति सूत्रों को अपनाने से न केवल ज्ञान प्राप्त होता है बल्कि जीवन को बेहतर कैसे बनाया जाए, सफलता कैसे पाई जाए, व्यक्तितत्व को कैसे निखारा जाएं आदि जैसी बातों के बारे में भी पता चलता है। तो आइए जानते हैं आचार्य चाणक्य के नीति सूत्र में वर्णित ऐसी ही कुछ श्लोक भावार्थ व अर्थात सहित जिनसे काफी कुछ जानने को मिलता है।

चाणक्य नीति श्लोक
भूषणानां भूषणं सविनया विद्या।
भाव : विनय से युक्त विद्या सभी आभूषणों की आभूषण है।
अर्थ- जो विद्वान विनम्र नहीं है, सहृदय नहीं है, लोकहितकारी नहीं है, वह विद्वान असुंदर से भी असुंदर है। वह अहंकारी और कुरूप है।

चाणक्य नीति श्लोक
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥
भाव- निश्चित है मृत्यु
अर्थ- आचार्य चाणक्य के अनुसार आगे बताई गई बातें माता के गर्भ में ही निश्चित हो जाती है। इन्हें कोई चाहकर भी बदल नहीं सकता। व्यक्ति कितने साल जिएगा, वह किस प्रकार का काम करेगा। उसके पास कितनी संपत्ति होगी। उसकी मृत्यु कब होगी।

चाणक्य नीति श्लोक
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रमित्राणि बान्धवाः ।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम् ॥
भाव- 1 पुण्य से हो सकता है कुल धन्य
अर्थ- पुत्र , मित्र, सगे सम्बन्धी साधुओं को देखकर दूर भागते है, लेकिन जो लोग साधुओं का अनुशरण करते है उनमें भक्ति जागृत होती है और उनके उस पुण्य से उनका सारा कुल धन्य हो जाता है।

चाणक्य नीति श्लोक
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी ।
शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जन-संगतिः ॥
भाव -संतजन पुरुषों की संगती का असर
अर्थ- जैसे मछली दृष्टी से, कछुआ ध्यान देकर और पंछी स्पर्श करके अपने बच्चो को पालते हैं, वैसे ही संतजन पुरुषों की संगती मनुष्य का पालन पोषण करती है।