अहमदाबाद में स्थित मानसिक रोगियों के हॉस्पिटल के मरीजों ने 30 हजार दीए तैयार किए हैं। यह अस्पताल स्टाफ की मेहनत का ही नतीजा है कि आज यहां के मरीज आत्मनिर्भर बन रहे हैं। हॉस्पिटल में मरीजों की मानसिक स्थिति और कार्यपद्धति को ध्यान में रखकर उनसे अलग-अलग तरह के काम करवाए जाते हैं। इससे सबसे बड़ा फायदा मरीजों को ही होता है, क्योंकि इससे मरीजों के दिमाग पर सकारात्मक असर हो रहा है।

अहमदाबाद के अमराई वाडी इलाके में रहने वाले सतीष 2016 से मानसिक रोगी हैं। बीमारी के चलते वे हमेशा तनाव में रहते थे। आखिरकार मजबूर होकर परिवार को उन्हें यहां छोड़ना पड़ा। हालाकिं, अब सतीष ठीक हो रहे हैं। अगले एक-दो साल में वे पूरी तरह ठीक हो जाएंगे। आज सतीष इतने ठीक हो चुके हैं कि वे अब कवि और लेखक भी बन चुके हैं। मौजूदा हालात पर तुरंत कविता लिख देते हैं।

ये सद्कर्मों का फल है कि हम बच गए... पर डर लगता है जब कोई हमको टच करे।
बनती बिगड़ी सबकी वो बनाता है... फिर काहे हमको डर कोरोना से लगता है।
वही तो सबका करता-धरता... फिर काहे कोरोना से डरना... कुदरत से नहीं बड़ा कोरोना।
जब है कुदरत तो काहे को कोरोना से डरना... कुदरत से नहीं बड़ा कोरोना... कुछ पल का मेहमान कोरोना।

हॉस्पिटल के ऑक्युपेशन थैरेपिस्ट विभाग की डॉ. सुनिता महेरिया कहती हैं कि हमारे यहां मरीज जब आते हैं, तब तक उनका दिमाग पूरी तरह अस्थिर हो चुका होता है। हम सबसे पहली उनकी पसंद और उनकी रुचि का पता लगाते हैं। इसके बाद उनकी मानसिक स्थिति के अनुसार थोड़ा-थोड़ा काम करवाते हैं। क्योंकि मरीज अपने पसंद के काम में बिजी हो जाता है तो उसका दिमाग स्थिर होने लगता है और वह मानसिक रूप से ठीक होने लगता है।

डॉ. सुनिता बताती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने हमें आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है। इसीलिए हमने सोचा कि क्यों इस बार मरीजों से दिवाली के लिए दीए बनवाएं जाएं। इसके लिए कई स्वंयसेवकों की मदद ली गई और इसी सुखद परिणाम आप देख सकते हैं कि इन मरीजों ने 30 हजार दीए तैयार कर दिए, जो कई घरों को रोशन करेंगे। इन आकर्षक रंग-बिरंगे दीपकों के लिए हमें कई कंपनियों से ऑर्डर तक मिल चुके हैं।