सिंहगढ़ राज्य की सीमा के पास एक गांव सोनपुर में एक महात्मा अपने दो शिष्यों के साथ आ पहुंचे। वहां की शांति और हरियाली देख कुछ दिन वे वहीं ठहर गए। एक दिन महात्मा जी जब भिक्षा मांगने जा रहे थे, सड़क पर एक सिक्का दिखा, जिसे उठाकर उन्होंने झोली में रख लिया। दोनों शिष्य इससे हैरान थे। वे मन में सोच रहे थे कि काश सिक्का उन्हें मिलता, तो वे बाजार से मिठाई ले आते। महात्मा जी भांप गए। बोले-यह साधारण सिक्का नहीं है, मैं इसे किसी सुपात्र को दूंगा। पर कई दिन बीत जाने के बाद भी उन्होंने सिक्का किसी को नहीं दिया। एक दिन महात्मा जी को खबर मिली कि सिंहगढ़ के महाराज अपनी विशाल सेना के साथ उधर से गुजर रहे हैं। महात्मा जी ने शिष्यों से कहा, 'वत्स! सोनपुर छोड़ने की घड़ी आ गई।' शिष्यों के साथ महात्मा जी चल पड़े। तभी राजा की सवारी आ गई। मंत्री ने राजा को बताया कि ये महात्मा जा रहे हैं। बड़े ज्ञानी हैं। राजा ने हाथी से उतर कर महात्मा जी को प्रणाम किया और कहा, 'कृपया मुझे आशीर्वाद दें।'  महात्मा जी ने झोले से सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर उसे रखते हुए कहा, 'हे सिंहगढ़ नरेश, तुम्हारा राज्य धन-धान्य से संपन्न है। फिर भी तुम्हारे लालच का अंत नहीं है। तुम और पाने की लालसा में युद्ध करने जा रहे हो। मेरे विचार में तुम सबसे बड़े दरिद हो। इसलिए मैंने तुम्हें यह सिक्का दिया है।' राजा इस बात का मतलब समझ गए। उन्होंने सेना को वापस चलने आदेश दिया।