स्मार्ट दिखने के लिए लोग क्या नहीं करते ब्यूटी पार्लर जाते हैं, महंगे प्रीम पाउडर और ब्यूटी टिप्स को आजमाते हैं। सारे उपाय करने के बावजूद बढ़ती उम्र की निशानियों को उम्र की एक सीमा तक ही छिपा सकते हैं। अंत में खूबसूरती ढ़ल जाती है और जिस सुन्दरता पर लोग नाज करते हैं वह लोगों से दगा कर जाती है। इसलिए संतों और ज्ञानियों ने कहा कि रूप के धन पर इतराना नहीं चाहिए। सबसे उत्तम धन ज्ञान है और इसकी सुन्दरता दिन ब दिन बढ़ती जाती है। इसलिए बाहरी सुन्दरता को संवारने पर समय नष्ट करने की बजाय अंदर की सुन्दरता को निखारने का प्रयास करना चाहिए। व्यवहारिक जीवन में आपने देखा होगा कि किसी की सुंदरता को देखकर आपका मन चाहता होगा कि बार-बार उसे देखें।  
लेकिन जब आप उस रूपवान व्यक्ति के पास पहुंचते हैं उसके व्यक्तित्व को करीब से जानते हैं तो उससे नफरत होने लगती है। इसके विपरीत किसी कुरूप व्यक्ति को जब आप जानने लगते हैं उसके अंदर के गुण को समझने लगते हैं तो उस कुरूप व्यक्ति के प्रति लगाव और स्नेह बढ़ जाता है।  देवी सीता के पिता महाराजा जनक के दरबार में हुई एक घटना इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इनके शासन काल अष्टावप्र नामक एक विद्वान थे। अपने नाम के समान अष्टावप्र का पूरा शरीर टेढ़ा मेढ़ा था। एक बार यह महाराजा जनक की सभा में पहुंचे। ऊंचे आसन पर बैठे सभासद अष्टावप्र को देखकर हंसने लगे। महाराज जनक ने देखा कि सामने से अष्टावप्र पधार रहे हैं। इन्हें देखकर ही सभासद हंस रहे हैं।   
महाराज जनक अपने सिंहासन से उतरकर अष्टावप्र के पास पहुंचे। इन्हें आदर पूर्वक लाकर अपने सिंहासन पर बैठाया और सभासदों से कहा कि महात्मा अष्टावप्र के चरण धोने हेतु जल लेकर आएं। महाराज ने स्वयं अपने हाथों से अष्टावप्र की सेवा की और सभासदों से कहा कि आप सब मूर्ख हैं जो बाहरी सौन्दर्य को पहचानते हैं। असली सौन्दर्य को आपने जाना ही नहीं। असली सुन्दरता ज्ञान है जो महात्मा अष्टावप्र के पास है। यह मेरे गुरू के समान हैं। सभासदों को सिर नीचे झुक गया। अष्टावप्र ने कई काव्य लिखे हैं। इन्होंने गीता की भी रचना की है जो अष्टावप्र गीता के नाम से विख्यात है।