नई दिल्ली
महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनावों की तारीख का ऐलान हो गया है। कांग्रेस के नेता भी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनावों का ट्रेंड ही इन दोनों राज्यों की विधानसभा चुनाव नतीजों में दिख सकता है। इन दोनों राज्यों के पिछले चुनाव नतीजों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि लोकसभा चुनाव परिणाम जैसा ही नजारा राज्यों में भी दिखा। 2014 के लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ बीजेपी सत्ता में आई थी और कुछ ही महीनों बाद हुए चुनाव में हरियाणा और महाराष्ट्र में भी बीजेपी सत्ता पर काबिज हुई। कांग्रेस नेता भी मान रहे हैं कि 5 साल बाद भी इस तस्वीर में बदलाव की कोई संभावना अभी नजर नहीं आ रही है।
महाराष्ट्र और हरियाणा में कमजोर नजर आ रही कांग्रेस
2019 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार से कांग्रेस को अभी उबरना है। कांग्रेस के पास दोनों ही राज्यों में नेतृत्व संकट है और दोनों ही राज्य इकाई में इस वक्त पार्टी के पास आम जनता के बीच लोकप्रिय चेहरा नहीं है। महाराष्ट्र में कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में करारी पराजय का सामना पड़ा। जिस राज्य में कांग्रेस इस वक्त बेहद लड़खड़ाई स्थिति में नजर आ रही है, वहीं कुछ वक्त पहले तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी। एनसीपी के साथ मिलकर कांग्रेस लगातार 15 साल 1999 से 2014 तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज रही। हरियाणा में भी कांग्रेस की खासी मजबूत पकड़ थी और 2005 से 2015 तक लगातार 10 साल तक पार्टी सत्ता में रही।
 दोनों ही राज्यों में आंतरिक कलह से जूझ रही है पार्टी
लोकसभा चुनावों के बाद दोनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए मुश्किल परीक्षा है। कांग्रेस की समस्या है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में पिछले 2 साल से पार्टी स्थानीय नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। बीजेपी के मनोहर लाल खट्टर और देवेंद्र फडणवीस जब शासन और आंतरिक मसलों पर संघर्ष कर रहे थे, कांग्रेस इसका फायदा नहीं उठा सकी। कांग्रेस के सचेत नहीं रहने का सीधा फायदा बीजेपी को मिला। बीजेपी ने इस मौके का फायदा उठाया और कांग्रेस और सहयोगी दलों को खासा कमजोर किया। बीजेपी के मजबूत होने का असर लोकसभा चुनाव में भी नजर आया और दोनों ही राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा।
2 साल में BJP ने जमकर चमकाई अपनी राजनीति
हरियाणा कांग्रेस चीफ अशोक तंवर को हटाकर पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा को इसी महीने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दे दी गई। पार्टी में कलह और गुटबाजी की खबरों के बीच पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा को विधानसभा में पार्टी का नेता घोषित किया गया। हालांकि, इन दोनों ही नामों की सिफारिश 2017 में तत्कालीन पार्टी प्रदेश प्रभारी कमलनाथ ने की थी। बीच के इस 2 साल में कांग्रेस प्रदेश में अपने ही मोर्च पर जूझती रही और बीजेपी ने अपनी राजनीति को खूब चमकाया।
 हरियाणा में ऐंटी-जाट राजनीति पर बीजेपी का जोर
2 साल के दौर में हरियाणा में कांग्रेस की बतौर मजबूत विपक्ष उपस्थिति लगभग नदारद ही रही। कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई जब बद से बदतर हो रही थी बीजेपी ने उसका प्रयोग खुद को ऐंटी-जाट राजनीति के विकल्प के तौर पर पेश करने में लगाया। कांग्रेस की राज्य में दयनीय स्थिति का अंदाजा 2019 में हुए जींद उप-चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार तीसरे नंबर पर आ गए।
महाराष्ट्र में भी हरियाणा जैसी कहानियां
हरियाणा ही जैसा हाल कांग्रेस का महाराष्ट्र में भी नजर आ रहा है। महाराष्ट्र में जातिवाद और कथित घोटाले की खबरों के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व के अभाव में इसका प्रयोग अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए नहीं कर सकी। कांग्रेस के नेता मुद्दों को अलग-अलग दिशा में ले जाते रहे और एकजुट होकर बीजेपी का सामना नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की और अब आंतरिक सूत्रों का कहना है कि इसके लिए काफी देर हो चुकी है।