तिथि में वृद्धि होने से अनंत चतुर्दशी का पर्व 12 और 13 सितंबर को दोनों ही दिन मनाया जाएगा। इतना ही नहीं,  दोनों ही दिन गणेश जी की प्रतिमाएं विसर्जित कर सकते हैं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार तीज तिथि उदया में नहीं मनने से यह स्थिति पैदा हुई है। इसलिए दो दिन तीज मनाई गई थी। राजधानी के ज्योतिषाचार्यों के अनुसार भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को ये पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान हरि की पूजा की जाती है। पूजा के बाद अनंतधागा धारण किया जाता है। इसे रक्षा सूत्र कहा जाता है। मान्यता है कि इस धागे को बांधने से समस्त परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है। अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति का विजर्सन भी होता है। इसी के साथ गणेशोत्सव का समापन हो जाता है। 12 सितंबर को पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 6 मिनट से अगले दिन 13 सितंबर को सुबह 7 बजकर 35 मिनट तक है। इस व्रत को सभी संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से दरिद्रता का नाश होता है और ग्रहों की बाधाएं भी दूर होती है।
     एक अन्य ज्योतिषाचार्यों के अनुसार तीज तिथि उदया में नहीं थी, क्षय थी। इसलिए इसके बाद की अगली तिथियों में वृद्धि हुई। इसलिए अनंत चतुर्दशी का शुभ मुहूर्त 12 सितंबर को सुबह 4ः24 बजे से और 13 को सुबह 6ः20 तक रहेगा। दोनों ही दिन गणेश विसर्जन किया जा सकता है। आत्मा और शरीर का मिलन अनंत है। भगवान श्रीकृष्ण का कथन है कि 'अनंत' उनके रूपों का एक रूप है और वे काल हैं, जिसे अनंत कहा जाता है। अनंत व्रत 14 वर्षों तक किया जाए, तो व्रती विष्णु लोक की प्राप्ति कर सकता है। अनंत चतुर्दशी पर विकारों का मंथन हुआ था। भगवान विष्णु जी शेषनाग की शैय्या पर विकारों से परे रहते हैं। अनंत चतुर्दशी व्रत में धारण किए जाने वाले अनंत सूत्र कपास या रेशम के धागे से बने होते हैं, जो कुमकुम रंग में रंगे जाते हैं। इस सूत्र में चौदह गांठे होती हैं। अनंत की चौदह गांठे चौदह लोकों की प्रतीत मानी गई हैं।