यह कोई पहली बार नहीं है, अंतरिक्ष ने हमें पहले भी छला है. पर जैसे कि हमने भी जिद ठान ली हो उसकी हर परत की पड़ताल कर लेने की. छलावे की इस कहानी को अब सोलह साल बीत चुके हैं. स्पेस शटल कोलंबिया महीने भर के घुमक्कड़ी के बाद फरवरी 2003 में धरती पर लौट रहा था. उस शटल में हरियाणा की बेटी कल्पना चावला भी थीं. यह अंतरिक्ष की उनकी दूसरी यात्रा थी. इससे पहले भी उन्होंने अंतरिक्ष की खाक छानी थीं. वह कहती थीं कि उनका जीवन ही अंतरिक्ष के लिए है. बचपन में कागजों पर अंतरिक्ष उकरने वाली कल्पना की सकुशल वापसी के लिए देश दुआ कर रहा था. पर जो हुआ वह हमारी कल्पना में भी नहीं था.

जब उनका शटल कामयाबी के आगाज के साथ धरती पर लौट रहा था. तभी अचानक सफलता का यह जश्न पलभर में ही मातम में बदल गया और हर मुस्कुराते चेहरे पर उदासी छा गई. सभी बेसब्री से कल्पना चावला के लौटने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन खबर कुछ और ही आई. वैज्ञानिकों ने बताया कि जैसे ही कोलंबिया ने पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया, वैसे ही उसकी ऊष्मारोधी परतें फट गईं और यान का तापमान बढ़ने से वह हादसे का शिकार हो गया. कल्पना अंतरिक्ष में समा गईं.

लेकिन यह जो इंसान है, वह ऐसे हादसों को हमेशा चुनौती देता है और उससे पार भी पा जाता है. हादसे में अपनी बेटी खोने के बाद भी हमने अंतरिक्ष से जुड़े मिशन से मुंह नहीं मोड़ा. लगातार और लगातार बढ़ते गए. छोटी-छोटी कई सफलताएं इसरो ने हासिल कीं. उसकी आत्मनिर्भरता बढ़ती गई.
अक्तूबर 2008 को इसरो ने देश का पहला चांद मिशन पूरा कर लिया था. चंद्रयान-1 सफलतापूर्वक अपने मिशन को अंजाम दे पाया था. इस मिशन की सफलता के लगभग छह साल बाद भारत ने 25 सितंबर 2014 को मंगल ग्रह की कक्षा में एक अंतरिक्षयान स्थापित किया. यह उपलब्धि कितनी बड़ी थी इसका अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि भारत ऐसा पहला देश था, जिसने अपनी पहली कोशिश में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली, दूसरी बड़ी खास बात यह थी कि यह अभियान बेहद कम खर्च में पूरा किया गया था। यह इतना सस्ता था कि अंतरिक्ष मिशन की पृष्ठभूमि पर बनी मूवी ग्रेविटी का बजट इस भारतीय मिशन से महंगा था.

इसरो की एक बड़ी उपलब्धि जीएसएलवीएमके3 का लॉन्च होना थी जीएसएलवीएमके3 देश का सबसे भारी रॉकेट था, जिसे 5 जून 2017 को इसरो ने लॉन्च किया था. यह रॉकेट अपने साथ 3,136 किग्रा का सैटेलाइट जीसैट-19 लेकर गया. इससे पहले 2,300 किग्रा से भारी सैटेलाइटों के प्रक्षेपण के लिए विदेशी प्रक्षेपकों पर हमें निर्भर रहना पड़ता था.

इस भारी-भरकम सैटेलाइट की लॉन्चिंग के बाद इसरो ने 14 फरवरी 2017 को इतिहास रच दिया. उसने पीएसएलवी के जरिए एक साथ 104 सैटेलाइट लांच करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया. इससे पहले इसरो ने 2016 में 20 सैटेलाइट एक बार में प्रक्षेपित किया था जबकि विश्व में सबसे अधिक रूस ने 2014 में 37 सैटेलाइट लांच कर रिकॉर्ड बनाया था. 2017 के अभियान में भेजे गए 104 उपग्रहों में से तीन भारत के अपने थे और बाकी 101 इजराइल, कजाखस्तान, नेदरलैंड्स, स्विटजरलैंड और अमेरिका के थे.

इसरो की उपलब्धियों की फेहरिस्त में एक तारीख 11 अप्रैल 2018 भी दर्ज है. इस दिन इसरो ने नेविगेशन सैटेलाइट आइआरएनएसएस लॉन्च किया था. यह स्वदेशी तकनीक से बनी नेविगेशन सैटेलाइट है. इस सैटेलाइट के लॉन्च होने से भारत अब अमेरिकी जीपीएस सिस्टम की तरह के अपने नेविगेशन सिस्टम से लैस हो गया. इसरो की ये उपलब्धियां बताती हैं कि इंसान किसी भी चीज के सामने हार नहीं मानता. माना कि दो किलोमीटर का इस बार का फासला हमें बहुत दूर ठेल गया, पर ऐसा नहीं कि ऐसी यात्राएं या ऐसी कोशिशें रुक जाती हैं.

अफसोस यह है कि इस दो किलोमीटर की यात्रा की चूक के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखीं, वे दयनीय हैं. यह सोचकर और जानकर थोड़ी हैरत होती है कि जिस मुद्दे पर हमें वैज्ञानिकों के साथ खड़ा होना चाहिए, उस पर हम फूहड़ मजाक कर रहे हैं. यह चुहल का विषय नहीं होना चाहिए था. इस पर राजनीतिक पार्टियों में हमें खंडित नहीं होना था, न प्रवक्ता बनना था और न ही विपक्ष.
पूरा भरोसा है कि इस दो किलोमीटर की नाकामी को तो हमारे वैज्ञानिक अगली दफे जरूर दूर कर लेंगे. चंद्रयान मिशन 2 की कमियों से सीख लेकर वह अगली दफे और सतर्क होंगे. बल्कि कहना चाहिए कि ऐसी नाकामियों से हम बहुत कुछ सीखते हैं और अगली दफे बड़ी कामयाबी हासिल करते हैं. जाहिर है हमारे वैज्ञानिक अपने मिशन में कामयाब होंगे.