यहां भोजपुर की पहाड़ी पर एक अद्भुत और विशाल, परंतु अधूरा शिव मंदिर है। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा किया गया था। मंदिर 115 फीट (35 मी॰) लंबे, 82 फीट (25 मी॰) चौड़े तथा 13 फीट (4 मी॰) ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है यहां का विशाल शिवलिंग, अपने-आप में अनूठे और विशाल आकार वाले इस शिवलिंग के कारण भोजेश्वर मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहा जाता है। चिकने लाल बलुआ पाषाण के बने इस शिवलिंग को एक ही पत्थर से बनाया गया है और यह विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है।

आधार सहित शिवलिंग की कुल ऊंचाई 40 फीट (12 मी॰) से अधिक है। शिवलिंग की लंबाई इसकी ऊंचाई 7.5 फीट (2.3 मी॰) तथा व्यास 5.8 फीट (2 मी॰) है। यह शिवलिंग एक 21.5 फीट (6.6 मी॰) चौड़े वर्गाकार आधार (जलहरी) पर स्थापित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुई हैं।

इसके साथ ही गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ पर भगवानों के जोड़े – शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सरस्वती, राम-सीता एवं विष्णु-लक्ष्मी की मूर्तियां स्थापित हैं। सामने की दीवार के अलावा बाकी सभी तीन दीवारों में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं हैं। मंदिर के बाहरी दीवार पर यक्षों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।

इस मंदिर को देखते ही समझ आता है कि यह सिर्फ एक मंदिर ही नहीं, अपने विशाल आकार के अलावा भी इस मंदिर की कई विशेषताएं हैं।

इसका विशाल प्रवेशद्वार का आकार-प्रकार वर्तमान में भारत के किसी भी मंदिर के प्रवेशद्वारों में सर्वाधिक विशाल है। इसके अंदर स्थापित शिवलिंग को देख, प्रवेशद्वार का यह आकार प्रासंगिक लगता है। इस मंदिर की एक अन्य विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।

साथ ही भोजेश्वर मंदिर की छत गुम्बदाकार हैं। कुछ विद्धान इसे भारत की प्रथम गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। और यह एक सशक्त प्रमाण है कि भारत में गुम्बद निर्माण का प्रचलन इस्लाम के आगमन के पहले भी था। इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में गुम्बद या शिखर निर्माण के प्रचलन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

प्राचीन स्थापत्य व वास्तुकला का महाविद्यालय: भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है। इस जगह की एक अद्भुत विशेषता यह भी है कि भोजेश्वर मंदिर के भूविन्यास, स्तंभ, शिखर, कलश व अन्य रेखांकन चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण किए हुए हैं।


आस-पास नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की अद्भुत योजना थी। मन्दिर निर्माण की स्थापत्य योजना के नक्शे व अन्य विवरण निकटस्थ पत्थरों पर उकेरा गया है। जिनसे मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों को स्पष्ट देखा जा सकता है। इतने स्पष्ट नक्शे और योजना को देख प्रतीत होता है कि यह निर्माण स्थल समकालीन शिल्पज्ञों, वास्तुकारों और अभियांत्रिकों के लिए एक महा-विद्यालय जैसा था।यहां एक वृहत मन्दिर परिसर बनाने की योजना थी, जिसमें ढेरों अन्य मन्दिर भी बनाये जाने थे। वास्तुविद मानते हैं कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक सम्पन्न होती तो यह मन्दिर परिसर भारत के सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में से एक होता।इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है और आश्चर्य भी होता है कि आखिर इतने भारी पत्थर, इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचाए गए होंगे? परंतु मंदिर के ठीक पीछे के भाग में एक ढलान बना है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था।यहां उल्लेखनीय है कि पूरे विश्व में कहीं भी निर्माण हेतु सामग्री को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक अब दिखाई नहीं देती। भोजेश्वर मंदिर में इसे प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों को मंदिर के शीर्ष तक पहुंचाया गया।प्राचीन विज्ञान का नमूना: प्राचीन भारतीय शिल्प और स्थापत्य कला के निर्माण की तकनीक अवश्य भिन्न थी। उल्लेखनीय है कि परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने इस विशाल मंदिर का निर्माण अपने विख्यात ग्रंथ समराङ्गणसूत्रधार के आधार पर करवाया था। समरांगणसूत्रधार भारतीय वास्तुशास्त्र से सम्बन्धित ग्रन्थ है।इस ग्रन्थ में 83 अध्याय हैं जिनमें नगर-योजना, भवन शिल्प, मंदिर शिल्प, मूर्तिकला तथा मुद्राओं सहित यंत्र। यंत्रों के बारे में (अध्याय 31, जिसका नाम 'यन्त्रविधान' है) वर्णन है जिसमें भारी वस्तुओं को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए आधुनिक हाइड्रोलिक्स सिद्धांत का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।अधूरे मंदिर का अबूझा रहस्य: परंतु यह अद्भुत मंदिर अपने आप में एक अबूझा, अनसुलझा रहस्य समेटे है।
भोजेश्वर मंदिर का निर्माण अधूरा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि निर्माण कार्य एकदम से ही रोक दिया गया होगा। इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है पर जनश्रुति है कि इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में होना था, परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए निर्माण अधूरा रह गया।

हालांकि इसके कारण अभी तक अज्ञात ही हैं किन्तु इतिहास वेत्ताओं का अनुमान है कि ऐसा किसी प्राकृतिक आपदा, संसाधनों की आपूर्ति में कमी अथवा किसी युद्ध के आरम्भ हो जाने के कारण ही हुआ होगा। शायद राजा भोज के निधन होने से भी इस प्रकार के निर्माण का रुकना तर्कसंगत प्रतीत होता है।