इन्दौर । भागवत वह कथा है जो जन्म-जन्मांतर के पुण्योदय के बाद नसीब होती है। स्वयं भगवान के श्रीमुख से जिस ग्रंथ की रचना हुई हो, वह कालजयी ग्रंथ ही होता है। भागवत को चाहे कल्पवृक्ष कह लें, या महासागर अथवा सदगुणों का भंडार - सबका सार यही है कि जीवन को मोक्ष की ओर प्रवृत्त करना है तो भागवत की शरण जरूरी है। भारत भूमि ही वह स्थान है जहां इतनी बड़ी संख्या में देवी-देवता अवतार लेकर इस सृष्टि का संचालन करते हैं।
चंद्रसरोवर मथुरा के भागवताचार्य पं. यादराम शास्त्री ने आज श्री नागर चित्तौड़ा महाजन वैश्य समाज के तत्वावधान में विश्वकर्मा नगर स्थित श्री नागर चित्तौड़ा मित्र मंडल मांगलिक भवन पर चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में वराह अवतार एवं कपिल गीता प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में मंगलाचरण के बीच मुख्य यजमान श्रीमती राधादेवी गुप्ता, गिरीश-अनिता गुप्ता, सीए महेंद्र हेतावल, हुकमचंद अकोतिया, ओंकारलाल गजेश्वर, दिलीप हेतावल आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। पं. शास्त्री यहां 14 सितंबर तक प्रतिदिन दोपहर 1 से सांय 6 बजे तक व्यासपीठ पर विराजित होकर कथामृत की वर्षा करेंगे। रविवार 8 सितं. को धु्रव एवं भरत चरित्र, 9 को प्रहलाद चरित्र एवं नृसिंह अवतार, 10 को राम एवं कृष्ण अवतार, 11 को बाललीला एवं छप्पन भोग, 12 को महारास एवं फागोत्सव तथा रूक्मणी विवाह, 13 को सुदामा चरित्र एवं गुरूगीता तथा शनिवार 14 सितंबर को सुबह यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति होगी। कथा प्रसंगानुसार उत्सव भी मनाए जाएंगे। समाज द्वारा भागवत ज्ञान यज्ञ के आयोजन का यह लगातार 27वां वर्ष है।
विद्वान वक्ता ने कहा कि भगवान के शब्दकोष में सुख या दुख नाम का कोई शब्द है ही नहीं। सुख और दुख हमारे कर्मो का फल है। हम जैसे कर्म करेंगे, फल भी वैसे ही मिलेंगे। भगवान के अवतार, सज्जनों के कल्याण और दुर्जनों के विनाश के लिए ही होते हैं। गंगा और अन्य नदियां तभी तक पूजनीय है, जब तक वे अपने किनारों की मर्यादा में बहती है। किनारे छोड़ने पर कोई भी उन्हें नहीं पूजता क्योंकि तब वही जीवनरेखा विनाश की बाढ़ लेकर आती है। मनुष्य के जीवन का भी यही सिद्धांत है।