पाकिस्तान के विज्ञान और तकनीकी मंत्री फवाद चौधरी ने चंद्रयान-2 की विफलता पर तंज कसने में जरा भी समय नहीं लिया। चौधरी ने चंद्रयान-2 को महज एक खिलौना करार देते हुए ट्वीट किया, 'जो काम आता नहीं है उससे पंगा नहीं लेते डियर इंडिया'।जिस तकनीक से चंद्रयान-2 को तैयार किया गया और अंतरिक्ष में भेजा गया, उस तकनीक को विकसित करने में खुद पाकिस्तान अभी बरसों दूर है। आइये जानते हैं कि चंद्रयान-2 पर भारत को नसीहत देने वाला पाक अंतरिक्ष कार्यक्रमों में खुद कहां पर खड़ा है। 

साल 1961 में हुई थी पाक अंतरिक्ष एजेंसी की स्थापना

पाकिस्तान की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको (स्पेस एंड अपर एटमॉस्फेयर रिसर्च कमीशन) की स्थापना साल 1961 में हुई थी। सुपारको अपने पहले संचार सैटेलाइट का प्रक्षेपण स्थापना के 50 साल बाद कर पाया, वह भी चीन के लॉन्च व्हीकल से और चीन की एयरोस्पेस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन की सहायता से। 

पाक अंतरिक्ष एजेंसी की स्थापना इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) से आठ साल पहले हुई थी। इसके बावजूद इसरो ने जहां एक लॉन्च में 104 सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर विश्व रिकॉर्ड बना चुका है वहीं, सुपारको को विफलताओं और असफलताओं का सामना ही करना पड़ा है।  

बजट और संसाधनों की कमी से जूझती रही है सुपारको

अपने 58 साल के सफर में सुपारको को उन्नति करने और नवीनता बरकरार करने के लिए जरूरी संसाधन आर्थिक सहायता के लिए जूझना पड़ा है। पाकिस्तान के कर्ज में डूबे होने के कारण एजेंसी के बजट को बढ़ाने की संभावना शून्य के बराबर ही है। 

हालांकि, सुपारको की बदहाली के लिए पाक की आर्थिक स्थिति ही जिम्मेदार नहीं है, वहां के नेताओं में इसके लिए दिलचस्पी ही नहीं होने से भी हालात इतने खराब हुए हैं। एजेंसी के लिए सबसे खराब समय 1980 और 1990 का दशक रहा, जब तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक ने सभी प्रमुख जारी प्रोजेक्ट्स की फंडिंग पर रोक लगा दी थी। इसकी जद में प्रमुख सैटेलाइट कम्यूनिकेशन लॉन्च कार्यक्रम भी आ गया। 

सेना ने मुश्किल कर दिया पाक का अंतरिक्ष का सफर

पाकिस्तान की अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव की नीति एजेंसी में भी दिखाई दी, जब पाक ने अहमदिया होने के चलते प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता अब्दुस सलाम से किनारा कर लिया। अब्दुस सलाम को दूर करते ही पाक ने सलाम के उस संभावित योगदान से भी दूर हो गया जो पाक को अंतरिक्ष में कहीं से कहीं पहुंचा सकता था। 

सेना के जनरलों ने एजेंसी में शीर्ष पदों पर अपने हिसाब से वैज्ञानिकों को नियुक्त किया और यह एजेंसी स्वतंत्र रिसर्च से भटक कर भारत का मुकाबला करने की कोशिश में लग गई। 

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री देने वाले पाक में कुछ ही संस्थान

दि एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री देने वाले गिने-चुने विश्वविद्यालय ही हैं और वैज्ञानिक रिसर्च और विकास को प्रतिबद्ध संस्थान इससे भी कम हैं। 

सुपारको को आवंटित किए गए निराश करने वाले बजट के बावजूद फवाद चौधरी ने हाल ही में दावा किया था कि पाकिस्तान साल 2022 में अंतरिक्ष में अपना पहला मानव मिशन लॉन्च करेगा। हालांकि, पूर्णत: अव्यवहारिक होने के चलते पाक मंत्री का यह दावा और खुद पाक मंत्री उपहास के पात्र बन गए। 

फिर भी, अगर एक मिनट के लिए भी पाक मंत्री के इस दावे को व्यावहारिक मान भी लिया जाए, तो ऐसा होना उस देश के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से नए युग की शुरुआत होगा, जो अपने पड़ोसी देशों के अंदरूनी मुद्दों को पूरी दुनिया के सामने लाने के लिए हाथ-पांव मार रहा है। 

पहले भी हंसी का पात्र बनते रहे हैं फवाद चौधरी

चंद्रयान-2 पर चौधरी ने मजाक तो किया लेकिन अपने एक ट्वीट में खुद सैटेलाइट की स्पेलिंग ही गलत लिख गए। इस तरह के बेसिर पैर के दावे करने वाले फवाद चौधरी ने पहली बार ऐसा नहीं किया है। इससे पहले भी वह ऐसे बिना तर्क और आधार के दावे करते रहे हैं।