भाषा, जो दूसरों तक अपने विचारों को पहुंचाने का माध्यम है, उसे भी राष्ट्रीय एकता के सामने समस्या बनाकर खड़ा कर दिया जाता है. अपनी भाषा के प्रति आकषर्ण होना अस्वाभाविक नहीं है और मातृभाषा व्यक्ति के बौद्धिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. पर हमें इस तथ्य को नहीं भुला देना चाहिए कि मातृभाषा के प्रति जितना हमारा आकषर्ण होता है, उतना ही आकषर्ण दूसरों को अपनी मातृभाषा के प्रति होता है। इसलिए भाषाई अभिनिवेश में फंसना कैसे तर्पसंगत हो सकता है? हमारे पूर्वाचर्यों ने एकता की सर्वोत्तम कसौटी प्रस्तुत की थी। वह है- जो तुम्हारे लिए प्रतिकूल है, वह तुम दूसरों के लिए मत करो। हमारा भाषाई प्रेम उस सीमा तक ही होना चाहिए जहां दूसरों के भाषाई प्रेम से उसकी टक्कर न हो। हर प्रांत का अपना भाषाई प्रेम है। उनके पारस्परिक संपर्प के लिए एक जैसी भाषा भी अपेक्षित होती है, जो उनके प्रेम को अक्षुण्ण रखते हुए एक-दूसरे को मिला सके। वह राष्ट्रीय भाषा होती है। प्रांतीय भाषा के प्रेम को इतना उभार देना कैसे उचित हो सकता है, जिससे प्रांतीय और राष्ट्रीय भाषाओं में परस्पर टकराहट पैदा हो जाए। राष्ट्रीय एकता के लिए इस विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।  
भाषा की समस्या को मैं सामयिक समस्या मानता हूं। इस समस्या को कभी-कभी उभार दिया जाता है और यह राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन जाती है। फिर भी इसमें स्थायित्व नहीं है। इसके आकषर्ण की एक सीमा है। यह लंबे समय तक जनता को आकृष्ट किए नहीं रख सकती। आर्थिक-सामाजिक वैषम्य तथा जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य राष्ट्रीय एकता की स्थाई समस्याएं हैं।  इनका समाधान हुए बिना राष्ट्रीय एकता का आधार मजबूत नहीं हो सकता। क्या हित-सिद्धि के भेद की भित्ति पर अभेद का प्रासाद खड़ा किया जा सकता है? क्या हीनता और उच्चता की उबड़-खाबड़ भूमि पर एकता के रथ को ले जाया जा सकता है? ऐसे कभी नहीं हो सकता।