आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता है। पदार्थ जब मनुष्य पर हावी हो जाए तो समस्या क्यों नहीं होगी? आसक्ति अपने आप में समस्या है। इस समस्या का समाधान पदार्थ के विस्तार में नहीं, संयम में है। संयम के पथ पर वही चल सकता है, जो पदार्थ से विरक्त होने लगता है। जिन लोगों को विरक्ति का पथ प्राप्त है, जो जीवनभर इस पथ पर चलने के लिए कृतसंकल्प हैं, उनके सामने किसी प्रकार का प्रलोभन नहीं होना चाहिए। पदार्थ जीवन की आवश्यकता की पूर्ति का साधन है, यह भाव जब तक प्रबल रहता है, उसके प्रति आसक्ति पैदा नहीं होती। किंतु जब पदार्थ साध्य बन जाता है, तब व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाता है।  
बदला हुआ दृष्टिकोण व्यक्ति को स्वच्छंद बनाता है, सुविधावादी बनाता है और उसे संग्रह की प्रेरणा देता है। स्वच्छंदता, सुविधावाद और संग्रहवृत्ति- ये तीन सकार साधना के विघ्न हैं। साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए इनका सीमाकरण करना ही होगा। वैचारिक स्वतंत्रता का जहां तक प्रश्न है, साधना के साध उसका कोई विरोध नहीं है। पर विचार की स्वतंत्रता की यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति अपनी सीमा, संविधान और परंपरा से विमुख होकर उच्छृंखल बन जाए। उच्छृंखलता या स्वच्छंदता जहां प्रवेश पा लेती है, वहां से अनुशासन, व्यवस्था आदि तत्वों का पलायन हो जाता है। यह स्थिति व्यक्ति और समूह दोनों के लिए हितकर नहीं है। सुविधा के साथ भी साधना का विरोध नहीं है। साधना के नियम जिस सीमा तक स्वीकृति देते हैं, उस सीमा में सहज रूप से कोई सुविधा प्राप्त होती हो तो उसका उपयोग सम्मत है। जैन साधना पद्धति में शरीर को साधने का विधान तो है, पर उसे कष्ट देना कभी अभीष्ट नहीं है।