इन्दौर । भागवत के प्रत्येक संदेश में जीवन को संस्कारित और वंदनीय बनाने के अनमोल मंत्र छुपे हुए हैं। भागवत का स्वाध्याय मानव से महामानव की मंजिल प्रशस्त बनाता है। दर्पण में वास्तविक तस्वीर तभी नजर आएगी, जब उस पर चढ़ी धूल साफ होगी। श्रीमद भागवत हमारे मन पर चढ़े काम, क्रोध और लोभ-मोह की धूल को हटाकर आचरण को निर्मल और पवित्र बनाती है। यह भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से प्रवाहित हुआ अमृत रूपी ऐसा निर्झर है, जो युगों-युगों से मानव मात्र का कल्याण बिना किसी भेदभाव के करते आ रहा है। 
 ये प्रेरक विचार हैं हरिद्वार के भागवताचार्य पं. कृष्ण देव शास्त्री के, जो उन्होने आज बालाजी सेवा संस्थान ट्रस्ट एवं जागृति महिला मंडल के तत्वावधान में बिचौली मर्दाना रोड, स्कीम 140 स्थित श्री वैष्णव धाम परिसर में तपोनिष्ठ संत स्वामी सच्चिदानंद परमहंस के सानिध्य में आयोजित भागवत ज्ञान यज्ञ के शुभारंभ सत्र में मारवाड़ी बोली में व्यक्त किए। इसके पूर्व अग्रवाल पब्लिक स्कूल के सामने से भागवतजी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई जिसमें बैंड बाजे, भजन एवं गरबा मंडलियां तथा मंगल कलशधारी महिलाएं भी भजनों पर नाचते-गाते हुए चल रही थी। मार्ग में स्वागत मंचों से पुष्प वर्षा कर भागवतजी का पूजन एवं आचार्य पं.शास्त्री का स्वागत किया गया। कथा स्थल पर व्यासपीठ का पूजन बालाजी सेवा संस्थान ट्रस्ट के प्रमुख डॉ. आरके गौड़, श्रीमती विनोद अहूलवालिया, समन्वयक श्यामबाबू बंसल, दीप्ति शर्मा आदि ने किया। कथा प्रतिदिन दोपहर 2.30 से सांय 6.30 बजे तक होगी। कल 6 अगस्त को सती चरित्र एवं धु्रव चरित्र, 7 को प्रहलाद चरित्र एवं नृसिंह अवतार, 8 को गजेंद्र मोक्ष, राम अवतार एवं कृष्ण जन्मोत्सव, 9 को गोवर्धन लीला एवं छप्पन भोग, 10 को कंस वध एवं रूक्मणी विवाह तथा रविवार 11 अगस्त को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष कथा के साथ समापन होगा। कथा स्थल पर भक्तों की सुविधा के लिए बैठक व्यवस्था, सुरक्षा, रोशनी, निःशुल्क वाहन पार्किंग सहित समुचित प्रबंध किए गए हैं।
भागवत की महिमा बताते हुए विद्वान वक्ता ने कहा कि भागवत जैसा विलक्षण ग्रंथ कोई और नहीं हो सकता क्योंकि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से प्रकट हुआ है। इसके प्रत्येक श्लोक और मंत्र में जीवन को चरित्रवान और नैतिक मूल्यों से संस्कारित करने के नुस्खे मौजूद हैं। मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है, इसे केवल पशुओं की तरह जीने के लिए भगवान ने हमें यह शरीर नहीं दिया है। जीवन की धन्यता तभी संभव है, जब हम अपने चरित्र और आचरण को भगवान की हर कसौटी पर खरा उतारने का पुरूषार्थ करें।