रायपुर। पारम्परिक ऊर्जा (बिजली) के उपभोग एवं खपत में वृद्धि के मद्देनजर इसके समाधान के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोत विकसित किये जा रहे हैं। इन्हीं में एक है बायोगैस (गोबरगैस) योजना। इसके देशव्यापी क्रियान्वयन हेतु भारत सरकार द्वारा 1981 से राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बायोगैस विकास कार्यक्रम प्रारंभ किया गया, ताकि ग्रामीणों को खाना पकाने के लिए साफ-सुथरा व प्रदूषणरहिर्त इंधन मिलने के साथ-साथ अच्छी खाद भी प्राप्त हो सके।
क्रेडा के सहायक अभियंता टी.आर. ध्रुव ने बताया कि बायोगैस एक स्वच्छ एवं सस्ता ईंधन है जिसमें विभिन्न ज्वलनशील गैसों का मिश्रण होता है, इसमें मुख्यतः मीथेन शामिल है जो सूक्ष्मजीवी सक्रियता द्वारा उत्पन्न होती है। इसका प्रयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है। गोबर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में मिलता है, जहां पशुओं को पाला जाता है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इन बायोगैस संयंत्रों की स्थापना कारगर साबित हो रही है। बायोगैस का प्रयोग खाना बनाने तथा प्रकाश पैदा करने में किया जाता है। वर्तमान में नवीन राष्ट्रीय बायोगैस संयंत्र खाद प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत कृषकों हेतु 2 घनमीटर से 4 घनमीटर तक के घरेलू बायोगैस संयंत्रों का निर्माण कार्य किया जा रहा है। धमतरी जिले में अब तक कुल 5130 इकाई बायोगैस संयंत्र स्थापित कर हितग्राहियों को लाभान्वित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त राज्य शासन द्वारा नरूवा, गरूवा, घुरूवा एवं बाड़ी योजनांतर्गत गौठान एवं हितग्राहियों के यहां परिवारमूलक बायोगैस संयंत्र निर्माण हेतु जोर दिया जा रहा है। क्रेडा द्वारा नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी के तहत चयनित ग्रामों में अब तक 38 बायोगैस संयंत्र के निर्माण कार्य पूर्ण किये जा चुके है।