भगवान के दरबार में भीड़ दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। हम सभी प्रार्थना की मुद्रा में कहीं न कहीं हाथ जोड़े हुए हैं। आधुनिकता, वैज्ञानिकता और प्रगतिशीलता के साथ प्रार्थना का ऐसा तालमेल शायद ही कभी दिखाई दिया हो। कभी-कभी यह आभास होता है कि लोगों की धर्म और भगवान में आस्था मजबूत होती जा रही है। अलग-अलग धाराएं अब साथ-साथ चलने के लिए एकमत हो रही हैं। यह साझापन एक अच्छा संकेत है। लेकिन यहां सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि क्या प्रार्थना हमें मानवीय होने का पाठ पढ़ा पा रही है? यह भी कि प्रार्थना में हमारा विश्वास कितना है?
मुझे ऐसे कितने ही भक्त मिले जो मंदिर सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि वे ईश्वर से शिकायत कर सकें कि उनकी प्रार्थना अभी तक कबूल क्यों नहीं हुई। यह जीवन का एक अजीब विरोधाभास है। आदमी श्रम तो कर रहा है, लेकिन उसका सारा उपक्रम गड्ढा भरने का नहीं, गड्ढा खोदने का है। सच तो यह है कि वह अपने मन के तल पर अशांत है, इसलिए उसकी प्रार्थना में नाराजगी का भाव है। उसमें संशय और अविश्वास है। वह भूल जाता है कि प्रार्थना अगर आस्थापूर्ण हो तो उसका असर होता ही है। अनास्थापूर्ण प्रार्थना का कोई लाभ नहीं होता, चाहे वह पूरी धरती और आसमान को गुंजाने वाली ही क्यों न हो। कमी सिर्फ पुकार की होती है, प्रभाव की नहीं। कमी आस्था, विश्वास और संकल्प की होती है।

दरअसल हमारे भीतर का संशय और अविश्वास ही हमें कहीं पहुंचने नहीं दे रहा है। हमारा न अपने कदमों पर विश्वास है, न अपनी राहों पर, न अपनी मंजिल पर और न ही अपने आप पर। फिर कहीं पहुंचें तो कैसे पहुंचें? हम यह याद रखें कि आस्था स्वयं सुख है। संशय स्वयं दुख है। आस्था से ही विश्वास जुड़ा है। विश्वास से ही हम जुड़े हैं। पूरी सृष्टि परस्पर विश्वास से ही जुड़ी हुई है। इसके टूटते ही सृष्टि की अखंडता भी टूट जाती है।
विश्वास जोड़ता है, संशय तोड़ता है। संशय परमात्मा, आत्मा, धर्म आदि से ही दूर नहीं करता है, घर-परिवार-समाज से भी अलग कर देता है। इतना ही नहीं, अपने आप से भी काट देता है। प्रार्थना भी विश्वास है। उसका ठोस संबंध उस क्षण से है, जिसे हम जी रहे हैं। उस क्षण पर अगर हमारा विश्वास नहीं है तो हमारा विश्वास उस जीवन पर कैसे होगा, जिसको हमने जिया है या जिसे हमें जीना है। जब वर्तमान जीवन पर ही विश्वास नहीं होगा, फिर अपने अस्तित्व पर विश्वास कैसे होगा? फिर कैसे सुनी जाएगी हमारी वह प्रार्थना, जो संशय की आंखों से की जाएगी? अगर आज इतनी प्रार्थनाओं के बाद भी अमानवीयता की पकड़ मजबूत हो रही है तो यह मान लेना चाहिए कि हम अंदर से कुछ हैं और बाहर से कुछ और हैं। यह दोहरापन ही सभ्यता को कमजोर कर रहा है। –आचार्य रूपचंद्र