कुंभ में महिला नागा साधुओं को लेकर हमेशा से उत्सुकता बनी रही है। लोग यह जानने को बेचैन रहते हैं कि कैसा होता है महिला नागा साधुओं का जीवन। आमतौर पर कुंभ या महाकुंभ में महिला नागा साधु नजर नहीं आती थी। यदि होती भी थीं तो पुरुष नागा साधुओं की छांव में। इस बार कुंभ आयोजन एक मायने में बेहद खास है। पहली बार नागा साधुओं के अखाड़े के बाद महिलाओं के अखाड़े भी धूम-धाम से निकले और महिला साधुओं ने शाही स्नान कर सभी विधान पूर्ण किए।


पुरुष साधुओं को सार्वजनिक तौर पर नग्न होने की इजाजत है लेकिन महिला साधु ऐसा नहीं कर सकती। हालांकि जूना अखाड़े की महिलाओं को यह इजाजत भी मिली हुई है। वैसे महिला नागा साधु को नग्न रहने की इजाजत नहीं है। खासकर कुंभ में डुबकी लगाने वाले दिन में तो एकदम नहीं।


नागा एक पदवी होती है। साधुओं में वैष्‍णव, शैव और उदासीन तीनों ही संप्रदायों के अखाड़े नागा बनाते हैं। नागा में बहुत से वस्त्रधारी और बहुत से दिगंबर (निर्वस्त्र) होते हैं। इसी तरह महिलाएं भी जब संन्यास में दीक्षा लेते हैं तो उन्हें भी नागा बनाया जाता है, लेकिन वे सभी वस्त्रधारी होती हैं।

हालांकि महिला साधुओं को बस एक ही कपड़ा पहनने की अनुमति होती है। यह कपड़ा भी सिला हुआ नहीं होता है। इसे 'गंती' कहा जाता है। इन महिलाओं को कुंभ के स्नान के दौरान नग्न स्नान भी नहीं करना होता है। वे स्नान के वक्त भी इस गेरुए वस्त्र को पहने रहती हैं।

महिला साधुओं का अखाड़ा माई बाड़ा :
13 अखाड़ों से जूना अखाड़ा साधुओं का सबसे बड़ा अखाड़ा है। प्रयागराज 2013 में जूना अखाड़े में महिलाओं के माई बाड़ा अखाड़े को भी जूना अखाड़ा में शामिल कर लिया गया था। इस बार प्रयागराज 2019 के कुंभ में किन्नर अखाड़े को भी अखाड़े मान्यता देकर जूना अखाड़ा में शामिल कर लिया गया है। किन्नर अखाड़े के प्रमुख लक्ष्मीनाराण त्रिपाठी है। हालांकि महिलाओं के इस अखाड़े से अलग अखाड़ों में भी कई महिला साधु हैं जो भिन्न भिन्न अखाड़ों से जुड़ी हुई हैं।

जूना अखाड़ा ने माई बाड़ा को दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा का स्वरूप प्रदान कर किया था। कुंभ क्षेत्र में माई बाड़ा का पूरा चोला बदल गया है और अखाड़े ने सहमति देकर मुहर लगा दी है। उस वक्त लखनऊ के श्री मनकामनेश्वर मंदिर की प्रमुख महंत दिव्या गिरी को संन्यासिनी अखाड़े का अध्यक्ष बनाया गया था।

इस अखाड़े की महिला साधुओं को 'माई', 'अवधूतानी' या 'नागिन' कहा जाता है। हालांकि इन 'माई' या 'नागिनों' को अखाड़े के प्रमुख पदों में से किसी पद पर नहीं चुना जाता है। लेकिन उन्हें किसी खास इलाके के प्रमुख के तौर पर 'श्रीमहंत' का पद दिया जाता है। श्रीमहंत के पद पर चुनी जाने वाली महिलाएं शाही स्नान के दौरान पालकी में चलती हैं। साथ ही उन्हें अखाड़े का ध्वज, डंका और दाना अपने धार्मिक ध्वज के नीचे लगाने की छूट होती है।अखाड़ा कुंभ पर्व में महिला संन्यासियों के लिए माई बाड़ा नाम से अलग शिविर स्थापित किया जाता है। यह शिविर जूना अखाड़े के ठीक बगल में बनवाया जाता है।


विदेशी संन्‍यासिन : जूना अखाड़े में दस हजार से अधिक महिला साधु-संन्यासी हैं। इसमें विदेशी महिलाओं की संख्या भी बहुतायत में है। खासकर यूरोप की महिलाओं के बीच नागा साधु बनने का आकर्षण बढ़ा है। यह जानते हुए भी कि नागा बनने के लिए कई कठिन प्रक्रिया और तपस्या से गुजरना होता है विदेशी महिलाओं ने इसे अपनाया है।

पिछले 2013 के कुंभ में फ्रांस की कोरिने लियरे 'नागा साधु' बनी थीं। उन्हें नया नाम दिव्या गिरी दिया गया। वैसे दिव्या ने 2004 में साधु की दीक्षा ली लेकिन कठित तप करने के बाद उन्हें नागा पद मिला। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड हाइजिन, नई दिल्ली से मेडिकल टेक्नीशियन की पढ़ाई पूरी की थी। उनका कहना है कि महिलाएं कुछ चीजे अलग से करना चाहती है।
वह कहती है कि अब हमारी नई पहचान है। भगवा कपड़ों में लिपटी दिव्या बताती है अभी भी अखाड़ों में पुरुष और महिलाओं में बराबरी नहीं आई है। फ्रांस की एक अन्य महिला अपना पुराना नाम नहीं बतातीं, लेकिन दीक्षा लेने के बाद उनका नाम अब संगम गिरि है। संगम गिरि ने अपने लिए महिला गुरुओं की तलाश शुरू कर दी है। एक नागा साधु को पांच गुरु चुनने होते हैं।

निकोले जैकिस न्यूयॉर्क में फिल्म निर्माण से जुडी थीं। वह 2001 में साधु बन चुकी है और अब कुछ महिला साधुओं के लिए संपर्क अधिकारी के तौर पर काम कर रही है। उनका कहना है कि भारत में महिलाएं अब तक अपने जीवन में पुरुषों पर निर्भर रही है। कभी पिता कभी पति और कभी बेटे पर, लेकिन पश्चिम में ऐसा नहीं होता। महिला साधु अपने अखाड़े में तकनीक का इस्तेमाल भी खूब कर रही है। जूना संन्यासिन अखाड़ा में तीन चौथाई महिलाएं नेपाल से आई हुई है। नेपाल में ऊंची जाति की विधवाओं के दोबारा शादी करने को समाज स्वीकार नहीं करता। ऐसे मे ये विधवाएं अपने घर लौटने की बजाए साधु बन जाती है।

गौरलतब है कि माई बाड़ा की अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं थी और न ही उनकी धर्मध्वजा अलग थी। महिला साधुओं की सभी धार्मिक गतिविधियां जूना अखाड़े के साथ सम्मिलित थीं। इस बीच अखाड़े में महिला साधुओं की संख्या बढ़ने पर उन्होंने अपने अलग अस्तित्व की मांग उठाई। उनकी मांग पर जूना अखाड़े ने प्रयाग कुंभ 2013 में महिला संन्यासियों की मांग पर विचार करने को बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में उनकी सभी मांगे स्वीकार कर उन्हें मान्यता दी गई।

कैसे बनती है कोई महिला 'नागा साधु'
कोई खास अलग प्रक्रिया नहीं होती है। नागा संन्यासिन बनने से पहले अखाड़े के साधु-संत उस महिला के घर परिवार और उसके पिछले जन्म की जांच पड़ताल करते हैं। संन्यासिन बनने से पहले महिला को यह साबित करना होता है कि उसका अपने परिवार और समाज से अब कोई मोह नहीं है। इस बात की संतुष्टी करने के बाद ही आचार्य महिला को दीक्षा देते हैं। फिर अपने सांसारिक वस्त्र उतारकर शरीर पर पीला वस्त्र धारण कर लेती हैं।

फिर उस महिला को अन्य नागा साधुओं की तरह ही जीवित रहते हुए ही मुंडन करवाकर अपना ही पिंडदान करना पड़ता है। फिर उस महिला को नदी में स्नान के लिए भेजा जाता है। महिला नागा संन्यासन पूरा दिन भगवान का जाप करती है और सुबह ब्रह्ममुहुर्त में उठकर शिवजी का जाप करती है। शाम को दत्तात्रेय भगवान की पूजा करती हैं।

इसके बाद दोपहर में भोजन करने के बाद फिर से शिवजी का जाप करती हैं और शाम को शयन। अखाड़े में महिला संन्यासन को पूरा सम्मान दिया जाता है। जब कोई महिला इन सब परीक्षा को पास कर लेती है तो उन्हें माता की उपाधि दे दी जाती है। जब महिला नागा संन्यासिन पूरी तरह से बन जाती है तो अखाड़े के सभी छोटे-बड़े साधु-संत उस महिला को माता कहकर बुलाते हैं।