गुजरे जमाने की दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख ने अपने कैरियर में एक अलग ही स्थान बनाया और अपनी अदाकारी से लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में राज किया है। आशा ने अभिनय की शुरुआत बतौर बाल कलाकर के तौर पर की थी। दस साल की उम्र में वह पहली बार फिल्म मां (1952) में नजर आईं। इसके बाद उन्होंने कुछ और फिल्मों में भी काम किया लेकिन स्कूल पूरा करने के लिए अभिनय छोड़ दिया। 
आशा ने 16 साल की उम्र में पर्दे पर वापसी करने की सोची। वह अब हीरोइन बनकर सिल्वर स्क्रीन पर आना चाहती थीं लेकिन उनके लिए ये बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। विजय भट्ट की फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' (1959) के लिए पहुंचीं आशा को खारिज कर दिया गया। उनका कहना था कि आशा में कुछ स्टार मैटीरियल नहीं है। इस रिजेक्शन के आठ दिन बाद फिल्म प्रोड्यूसर सुबोध मुखर्जी और राइटर डायरेक्टर नासिर हुसैन ने उन्हें शम्मी कपूर के साथ फिल्म 'दिल देके देखो' (1959) में बतौर हीरोइन कास्ट किया। इस फिल्म ने आशा को एक बड़ा प्लैट फॉर्म दिया और एक बड़ी स्टार बन गईं।आशा के अंदर एक्टिंग के लिए लगाव ऐसा था कि वह किसी की नकल उतारने में भी कम नहीं थीं। वह स्कूल के दिनों में यह काम खूब किया करती थीं। एक टीवी शो क्लासिक लीजेंड्स के एक एपिसोड में जावेद अख्तर ने बताया था कि आशा बचपन में अपने दोस्तों और टीचर्ल की नकल किया करती थीं। इस अभिनेत्री को अपने जीवन में पसंद का हमसफर नहीं मिल पाया और वह अविवाहित ही रहीं।