बोलने और सुनने में अक्षम ऋतिक सिंह ने दिखाया है कि अगर हिम्मत और जज्बा हो तो सब कुछ संभव है। जन्म से दिव्यांग ऋतिक के अनुसार, जब उन्होंने जूडो खेलने की इच्छा जताई थी तो लोगों ने उनका मजाक बनाया। 16 साल के ऋतिक ने जूडो ट्रेनिंग के कुछ महीनों के अंदर ही जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी धाक जमाकर सबका ध्यान खींचा।
ऋतिक ने इसी साल गोरखपुर में हुई राष्ट्रीय जूनियर जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के साथ ही बेस्ट जूडोका का अवॉर्ड भी जीता है। ग्रिपिंग पर शानदार पकड़, क्विक अटैक उनकी खासियत है। चे तेचिकावारा (ब्लैक बेल्ट, जापान) उनके रोल मॉडल हैं। उन्होंने कहा, 'टीवी पर खिलाड़ियों को जूडो में पदक जीतता देख मैंने भी जूडो सीखने की ठानी। सुनने और बोलने में अक्षम होने की वजह से मुझे दिक्कत हुई पर मैंने हार नहीं मानी। वर्ल्ड चैंपियन मिकी तनाटा (जापान) से मिलने के बाद उन्हें मैंने अपना रोल मॉडल बनाया। मैं ओलिंपिक में स्वर्ण जीतना चाहता हूं।'
इन स्पर्धाओं में हासिल की जीत 
2013 में दिल्ली में दूसरे नैशनल ब्लाइंड ऐंड इंडिया डेफ जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण 
2014 में गोवा में आयोजित थर्ड नैशनल ब्लाइंड ऐंड डेफ जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण 
2016 में लखनऊ में नैशनल ब्लाइंड ऐंड इंडिया डेफ जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण 
2017 में हरियाणा में आयोजित 5वीं नैशनल ब्लाइंड ऐंड डेफ जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण 
इस तरह की ट्रेनिंग 
ऋतिक हर रोज सुबह और शाम के वक्त करीब पांच से छह घंटा ट्रेनिंग करते हैं। सुबह स्ट्रेचिंग करने के अलावा रनिंग, योग के बाद हल्की प्रैक्टिस के बाद रिलैक्स करते हैं। शाम को कोच की मौजूदगी में ट्रेनिंग के बाद मैच के लिए रणनीति तैयार करने के दौरान अपनी खामियों पर कोच से बात करके उसे ठीक करते हैं।