कहते हैं कि महान से महान व्यक्ति की भी अंतिम समय में भी यदि कोई इच्छा होती है तो वो सिर्फ और सिर्फ और महान बनने की ही होती है। मतलब सम्मान प्राप्त करना किसे अच्छा नहीं लगता है, ऐसे में जरुरी हो जाता है कि सम्मान प्राप्त करने के संबंध में विचार किया जाए और उस रास्ते पर आगे बढ़ा जाए। यह सच है कि जीवन में सम्मान स्वयं से प्राप्त नहीं होता बल्कि अपने कर्मों के द्वारा कमाया जाता है। ऐसे में यदि कहा जाए कि सम्मान प्राप्त करने के लिए धैर्य की आवश्यकता है तो आप मानेंगे नहीं, लेकिन यह सच है कि आप जितना सहनसील होंगे आपको उतना सम्मान प्राप्त होता चला जाएगा। तितिक्षा यानि सहनशीलता से सम्मान जरूर प्राप्त होता है। ऐसे में जीवन में सम्मान प्राप्त करने की इच्छा रखने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, बल्कि इसकी अपेक्षा खुद को सहनशील बनाते हुए प्रयास करना अधिक श्रेयस्कर होता है। ऐसे में कहा जा सकता है कि महान वह नहीं होता जिसके जीवन में सम्मान है अपितु सम्माननीय तो वही है जिसके जीवन में सहनशीलता विद्यमान है, क्योंकि सहनशीलता अथवा तितिक्षा ही तो साधु का और श्रेष्ठ पुरुषों का आभूषण है। सम्मान प्राप्त होना बुरी बात नहीं मगर मन में सम्मान की चाह रखना अवश्य श्रेष्ठ पुरुषों के स्वभाव के विपरीत है। किसी के जीवन की श्रेष्ठता का मूल्यांकन इस बात से नहीं होता कि उसे कितना सम्मान मिल रहा है अपितु इस बात से होता है कि वह व्यक्ति कितनी सहनशीलता के साथ जीवनयापन कर रहा है।