इन्दौर । संत जीवन में आ जाते हैं तो बसंत भी आ जाता है। बसंत के ठीक पूर्व सूखे वृक्षों से झड़े पत्तों का शोर अच्छा नहीं लगता लेकिन इसके तुरंत बाद जब प्रकृति पूरी तरह प्रसन्नता, उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति करती है तब लगता है कि बसंत आ गया। यही स्थिति संत की होती है। जहां संत, वहां बसंत। जीवन बिता देना, मंदिर में जाकर बैठ जाना या तीर्थयात्रा कर लेना आसान है, लेकिन जीवन को आदर के साथ समझना मुश्किल है। मन पर अहंकार की परत चढ़ी होने के कारण भगवत अनुभूति नहीं होती, न ही कण-कण में रची बसी प्रकृति की खुशबू मिलती है। बड़ी गाड़ी और बड़ा घर देखकर किसी के बड़े होने का अंदाज मत लगा लेना, असली बड़ा तो वो होता है जिसके घर में बुजुर्ग प्रसन्न रहते हों।  
वृंदावन से आए प्रख्यात कथाव्यास एवं परम रसिक श्रीहित अम्बरीशजी ने आज रवींद्र नाट्यगृह में अग्रवाल महिला मंडल की मेजबानी में चल रहे तीन दिवसीय भक्तमाल कथा के समापन दिवस पर उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। महिला मंडल की ओर से श्रीमती शोभा जैन, अध्यक्ष प्रेमलता अग्रवाल, निर्मला अग्रवाल, शीला अग्रवाल, कृष्णा गर्ग, रमा गर्ग, राजेश अग्रवाल आदि ने प्रारंभ में संतश्री की अगवानी की। समाजसेवी शंभूदयाल अग्रवाल, विष्णु बिंदल, टीकमचंद गर्ग, किशनलाल ऐरन, पी.डी. अग्रवाल सहित समाज के अनेक वरिष्ठ बंधु आज भी उपस्थित थे। 
यह जीवन निर्माण का यज्ञ है... - रवींद्र नाट्यगृह में गत 17 मई से वृंदावन के कथाव्यास श्रीहित अम्बरीशजी के श्रीमुख से भक्तमाल कथा श्रवण के लिए पहले दिन से ही भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। न स्वागत, न सत्कार....न पुष्पमालाओं से स्वागत करने वालों की भरमार और न ही स्वागत करने वालों के नामों की पुकार... आगे की चार पंक्तियों में वीआईपी के लिए बैठक व्यवस्था... अम्बरीशजी के शब्दों में वीआईपी अर्थात वेरी इंटरेस्टिंग पर्सन, नाॅट वेरी इम्पारटेंट। तीनों दिन कथा में पिनड्राप सायलेंट की स्थिति पूरे समय बनी रही। अम्बरीशजी भजन शुरू करते और पहली पंक्ति के बाद बाकी का पूरा भजन सभागृह की ओर से गूंजने लगता। आज भी ‘मन लागा मेरा यार फकीरी में....’ एवं अन्य भजनों के दौरान ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। ताल से ताल और सुर से सुर मिलाने की मानो होड़ लगी रही। अम्बरीशजी ने पहले दिन ही बोल दिया था, जिन्हें सोने की आदत हो वे पीछे जाकर बैठ जाएं। यह मनोरंजन या किस्से कहानी का अवसर नहीं, बल्कि जीवन निर्माण का यज्ञ है इसलिए यहां सावधानी से बैठें। हुआ भी यही, तीनों दिन इस कथा में ऐसा माहौल देखने को मिला, जैसा पहले कहीं नहीं देखा गया। 
अग्रवाल महिला मंडल की मेजबानी में चल रहे इस अनुष्ठान का आज समापन दिवस था। कथा के लिए निर्धारित 4 बजे के एक घंटे पहले ही श्रोता आकर अपनी सीटें रूमाल या पानी की बॉटल रखकर आरक्षित करते रहे। कल भी जिन्हें जगह नहीं मिली वे बीच के हिस्से में फर्श पर बैठकर राजी थे। अम्बरीशजी ने कहा भी कि मेरी कथा में थोड़ा कड़ा अनुशासन हैं, लेकिन मैं किसी से स्वागत कराने के लिए सामने बैठे दो हजार लोगों का समय बर्बाद करने का दोषी नहीं बनना चाहता। मेरी दृष्टि में एक लाख में से एक हजार रूपया दान करने वाला विशिष्ट नहीं बन सकता। विशिष्ट तो वह मां है जो घरों में जूठे बर्तन साफ करने के बाद बचे हुए पैसों से अपने बेटे या बेटी की पढ़ाई करा रही है। पहली बार इंदौर आकर मुझे बहुत अच्छा लगा, यह संस्कारों की नगरी है और यहां बड़े-बड़े संत-विद्वान आते रहते हैं। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। आप सभ्य और शालीन लोग हैं, इसलिए प्रार्थना कर रहा हूं कि आने वाली पीढ़ी को भी यह सब सौंपा जाएं जो हमें हमारे पूर्वजों ने बड़ी मेहनत के बाद संजोकर सौंपा है। मंडल की निवृत्तमान अध्यक्ष शोभा जैन के अनुसार पहली बार रवींद्र नाट्यगृह में जूते-चप्पल बाहर उतारकर प्रवेश देने की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए बाहर निःशुल्क जूता-चप्पल स्टैंड लगाया गया था। इसके साथ ही मौसम के अनुरूप प्रत्येक श्रोता के लिए ठंडे पानी की छोटी बोतल भी दी गई थी। तीनों दिन यह प्रयोग किया गया जो सफल रहा। 
अपने प्रवचनों में अम्बरीशजी ने कहा कि हमारे जीवन में कोई न कोई सहयोगी होता ही है। अपने सेवकों को भी भले ही हम वेतन देते हों, पर उन्हें भी प्रेम और आदर देना न भूलें। हम पूरे विश्व की जानकारी रखते हैं लेकिन स्वयं अपनी जानकारी से अनजान हैं। हम कौन हैं, क्यों हैं, कहां से आए, क्यों आए, हमारा लक्ष्य क्या है, इनका बोध भी होना चाहिए। जीवन में जब तक सत्संग के प्रसाद से प्राप्त विवेक न हो, तो ऐसा जीवन ही क्या। जीवन की सर्वश्रेष्ठ संभावना यह है कि हम उसे पा सकें, जिसे पाने के बाद कोई अन्य याचना नहीं करना पड़े। मीरा, कबीर और सूर का चरित्र सुनें तो ऐसे बैठें कि मानो वे हमारे पास ही हैं। इनके पास से जब भी लौटें, कोई प्रेम और भाव लेकर लौंटे। तुलसी के नाम में दैन्यता, रैदास में सेवा और नानक में कृतज्ञता के भाव हैं। हम तर्क बहुत करते हैं। तर्क मतलब विश्वास का अभाव। तर्क की ही बात करें तो जन्मदिन पर गोबर जैसा केक काटने और दीपक बुझाने या आधी रात को आसुरी बेला में जन्मदिन मनाने का क्या कारण है। इसी तरह फाड़कर फाड़कर कपड़े पहनने का कोई कारण है। मुझे गर्व है कि मेरा जन्म भारत भूमि पर हुआ है और अगले जन्म में भी मैं इसी भूमि पर जन्म लेना चाहूंगा क्योंकि यहां संस्कारों से समृद्ध बनने के अवसर हमेशा उपलब्ध हैं।