इन्दौर । भागवत केवल कथा नहीं, भारत भूमि का धर्म भी है। हमारे कर्मों में सदाचार, संस्कार और परमार्थ का चिंतन ही सच्चा भागवत धर्म है। साधना और भक्ति  के मार्ग पर चलने वालों को अनेक परीक्षाएं देना होती हैं। केवल पूजा-पाठ कर लेने से ही धर्म-कर्म नहीं हो जाता, धर्म के साथ सदगुणों को भी आत्मसात करना होगा। नर में नारायण के दर्शन का भाव जब तक हमारे अंतर्मन में नहीं बनेगा, हमारी पूजा और तीर्थयात्रा अधूरी ही होगी। भगवान भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं। भगवान कृष्ण ने पूतना से लेकर कंस के वध किए, लेकिन उनकी हिंसा में समाज के प्रति कल्याण और विवेक का भाव था। 
वृंदावन के प्रख्यात भागवत भूषण डॉ. मनोज मोहन शास्त्री ने आज श्री हरि सत्संग समिति के तत्वावधान में राजीव गांधी चैराहा स्थित शुभकारज गार्डन पर आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञानयज्ञ में सुदामा चरित्र सहित अन्य प्रसंगों के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में सुदामा-कृष्ण मिलन का भावपूर्ण उत्सव भी मनाया गया। कथा स्थल को विशेष रूप से फूलों एवं गुब्बारों से सजाया गया था। प्रारंभ में आयोजन समिति की ओर से समाजसेवी विनोद अग्रवाल, दिनेश मित्तल, सुनील गुप्ता, टीकमचंद गर्ग, सुभाष अग्रवाल फार्मा, रामदास गोयल आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। संध्या को आरती में श्रीमती कांता अग्रवाल, वर्षा बंसल, राजकमल माहेश्वरी, प्रज्ञा नीलेश अग्रवाल, शशि गोयल, शशि ऐरन, सारिका गोयल आदि ने सैकड़ों भक्तों के साथ भाग लिया। संयोजक राजेश कुंजीलाल गोयल ने बताया कि गुरूवार 4 अप्रैल को सुबह 9 बजे से यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति होगी। इस अवसर पर डॉ. शास्त्री का शहर के विभिन्न धार्मिक संगठनों की ओर से सम्मान भी किया जाएगा। 
 भागवत धर्म की व्याख्या करते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि भगवान कृष्ण ने भी दुष्टों के नाश के लिए हिंसा का प्रयोग किया लेकिन उनकी हिंसा में विवेक और कल्याण का भाव था। हमारी हिंदू संस्कृति किसी का अनादर और अपमान नहीं करती, इसीलिए भारतीय संस्कृति को सनातन माना गया है। धर्म के क्षेत्र में जिन्हें क्रांति करना हो, वे हमारे वेद का आश्रय लेकर अपनी संस्कृति की गहराई को समझ सकते हैं। सुदामा तीन मुट्ठी चावल के लिए चार घरों में याचना करने जाते थे लेकिन उन्हें भगवान के वैभव एवं राजमहल से कोई द्वेष नहीं था। भगवान चाहते तो अपने बालसखा को एक क्षण में ही अमीर बना सकते थे लेकिन उन्होंने पहले सुदामा को निर्धनता प्रदान की। भगवान एक दार्शनिक और चिंतक भी हैं। आज इसीलिए उनके कर्मों को सारी दुनिया पूजती और याद रखती है। दूसरों की संपत्ति देखकर खुश रहना भी हमें आना चाहिए। भागवत धर्म बहुत व्यापक है। हमें सात पीढियों के भरण-पोषण का धन वैभव भी मिल जाए तो संतुष्टि नहीं होती। भागवत का पहला सूत्र यही है कि बहुत कम समय के जीवन में हम संतुष्ट और प्रसन्न रहने का पुरूषार्थ करें। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं लेकिन अपनी पूर्ति के बाद भी हम नर में नारायण के दर्शन की अनुभूति करते रहें, धर्मसभा के साथ गृहसभा की जिम्मेदारी भी निभाएं और परमार्थ, सदभाव, अहिंसा एवं सहिष्णुता का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें, यही धर्म का सही स्वरूप होगा।